लेखिका : कामिनी सक्सेना

हम लोग जहां रहते हैं वो एक पुराना मुहल्ला है। पुराने टाईप के घर है, आपस में लगे हुए। लगभग सभी की छतें एक दूसरे से ऐसे लगी हुई थी कि कोई भी दूसरे की छत पर आ जा सकता था। मेरे पड़ोस में कॉलेज के तीन छात्रों ने एक कमरा ले रखा था। तीनों ही शाम को छत पर मेरे से बातें करते थे, हंसी मजाक भी करते थे। उन तीनों लड़कों को देख कर मेरा मन भी ललचा जाता था कि काश ये मुझे चोदते और मैं खूब मजे करती। कभी कभी तो उनके सपने तक भी आते थे कि वो मुझे चोद रहे हैं। कभी कभी मौसम अच्छा होने पर वो शराब भी पी लेते थे, मुझे भी बुलाते थे चखने के लिये … पर मैं टाल जाती थी।

मेरे पति धन्धे के सिलसिले में अधिकतर मुम्बई में ही रहते थे। घर पर सास और ससुर जी ही थे। दोनों गठिया के रोगी थे सो नीचे ही रहा करते थे। आज मौसम बरसात जैसा हो रहा था। मैंने एक बिस्तर जिस पर मैं और मेरे पति चुदाई किया करते थे, उसे बरसात में धोने के लिये छत पर ले आई थी। उस पर लगा हुआ वीर्य, पेशाब के दाग, क्रीम, और चिकनाई जो हम चुदाई के समय काम में लाते थे, उसके दाग थे, वो सभी मैं बरसात के पानी से धो देती थी। ऊपर ठण्डी हवा चल रही थी। शाम ढल चुकी थी। अन्धेरा सा छा गया था।

ठण्डी हवा लेने के लिये मैंने अपनी ब्रा खोल कर निकाल दी और नीचे से पेन्टी भी उतार दी। अब चूत में और चूंचियो में वरन सारे शरीर में ठण्डी हवा लग रही थी। दूसरी छत पर तीनों लड़के बण्टी, नीटू और चीकू दरी पर बैठे हुये शराब की चुस्कियाँ ले रहे थे।

“अरे कामिनी दीदी आओ, देखो कितना सुहाना मौसम हो रहा है !” बण्टी ने मुझे पुकारा।

“नहीं बस, मजे करो तुम लोग, चीकू, बधाई हो, 80 पर्सेन्ट नम्बर आये हैं ना !” मैंने चीकू को बधाई दी।

“दीदी आओ ना, मिठाई तो खा लो !” चीकू ने विनती की।

मैं मना नहीं कर पाई और उनके पास चली आई। मिठाई थोड़ी सी थी जो उन्होंने मुझे दे दी। मैं मिठाई खाने को ज्योंही झुकी मेरे बोबे उन्हें नजर आ गये। अब वो तीनों जानबूझ कर मेरी चूंचियां झांक कर देखने कोशिश करने लगे। मैंने तुरंत भांप लिया कि वो क्या कर रहे हैं। पर मौसम ऐसा नशीला था कि मेरा मन मैला हो उठा। उन तीनों के लण्ड के उठान पर मेरी नजर पड़ गई। उनके पजामे तम्बू की तरह धीरे धीरे उठने लगे। मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था।

“दीदी, हमारे बीच में आ जाओ और बस चीकू के नाम एक पेग !”

मैंने इसे शुरुआत समझी और बण्टी और चीकू के बीच में बैठ गई। इसी बीच चीकू ने मेरे चूतड़ पर हाथ फ़ेर दिया। मैंने उसे जान करके ध्यान नहीं दिया। पर एक झुरझुरी आ गई।

“लो दीदी, एक सिप … “

“नहीं पहले मैं दूंगा … ।”

दोनों पहल करने लगे और उनका जाम छलक गया और मेरे कपड़ो पर गिर गया। चीकू ने तुरन्त अपना रुमाल लेकर मेरी छाती पोंछने लगा। बन्टी कहां पीछे रहने वाला था, उसने भी हाथ मार ही दिया और मेरी चूंचिया दब गई। मेरे मुख से हाय निकल गई।

मैंने भी मौका जानकर अपना हाथ चीकू के लण्ड पर रख दिया और दबाते हुई बोली,” अरे बस करो, मैं साफ़ कर लूंगी … ” और उसका लण्ड छोड़ दिया। तभी बारिश होने लगी। चीकू समझ नहीं पाया कि लण्ड को जानकर के पकड़ा था या नहीं।

“चलो चलो अन्दर आ जाओ … ।” चीकू ने कहा।

हम काफ़ी भीग चुके थे, मेरा ब्लाऊज भी चूंचियो से चिपक गया था। सफ़ेद पेटीकोट भी चिपक कर पूरा गाण्ड का नक्शा दर्शा रहा था। पर मेरे मन में तो आग लग चुकी थी, बरसात भली लग रही थी। जैसे ही मैं खड़ी हुई तीनों मुझे बेशर्मी से घूरने लगे। मैं दीवार को लांघ कर अपनी छत पर आ गई और झुक कर बिस्तर धोने लगी। मैंने देखा कि तीनों अन्दर जा चुके थे। अन्दर की आग धधक उठी थी। हाथ से चूत दबा ली और मुख से हाय निकल पड़ी। मैं ब्लाऊज के ऊपर से ही अपनी चूंचियाँ मलने लगी। मेरा पेटीकोट पानी के कारण चिपक गया था। बरसात तेज होती जा रही थी। मेरा बदन जल रहा था। ठन्डा पानी मुझे मस्त किये दे रहा था।

इतने में मुझे लगा कि दीवार कूद कर कोई आया, देखा तो चीकू था।

“दीदी मैं धोने में मदद कर देता हूँ …! ” और बिस्तर धोने लगा। अन्धेरे का फ़ायदा उठा कर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“अरे छोड़ ना … ” पर उसने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया, और एक कोने में आ गया।

“दीदी, तुम कितनी अच्छी हो, बस एक किस और दे दो … ” मुझ पर अपने शरीर का बोझ डालते हुए चिपकने लगा। मैं कांप उठी, जिस्म कुछ करने को मचल उठा। इतने जवान लड़के को मैं छोड़ना नहीं चाह रही थी। मेरे होंठ थरथरा उठे, वो आगे बढ़ आया … उसके होंठ मेरे होंठो से चिपकने लगे। अचानक ही चीकू ने मेरे जिस्म को भींच लिया। मेरे बोबे उसकी छाती से दब कर मीठी टीस से भर उठे। उसके लण्ड का स्पर्श मेरी चूत के निकट होने लगा। मैंने भी अपनी चूत उसके लण्ड पर सेट करने लगी, और अब लण्ड मेरे बीचोबीच चूत की दरार पर लगने लगा था।

“चीकू, बस अब हो गया ना … चल हट !” बड़े बेमन से मैंने कहा। पर जवाब में उसने मेरे बोबे भींच लिये और मेरा ब्लाऊज खींच लिया। उसने मेरे बोबे दबा कर घुमा दिये।

“दीदी, ये मस्त कबूतर ! इनकी गरदन तो मरोड़ने दो …! ” मेरे मुख से हाय निकल पड़ी, एक सीत्कार भर कर उसका लण्ड पकड़ कर खींच लिया।

“चीकू, ये मस्त केला तो खिला दे मुझे … अब खुजली होने लगी है !” मेरे मुख से निकल पड़ा और चीकू ने मेरा पेटीकोट उठा दिया। उसने अपना पजामा भी उतार दिया। मुझे उसने धक्का दे कर गीले बिस्तर पर लेटा दिया और भीगता हुआ मेरी चूत के पास बैठ गया। मैंने अपनी दोनों बाहें खोल दी।

“आजा … चीकू … हाय जल्दी से आजा …! ” उसने उछल कर अपनी पोजीशन ली और दोनों हाथ से मेरे बोबे भींच लिये और लण्ड को भीगती हुई चूत पर रख दिया और मेरे ऊपर लेट गया।

“लगा ना … अब प्लीज … अब मजा दे दे … ” मैंने उसे चोदने का निमन्त्रण दिया और मेरे बदन में ठण्डे पानी के बीच उसका गरम लौड़ा मेरे जिस्म में समाने लगा। मैं भी चूत ऊपर की ओर दबा कर पूरा लण्ड घुसेड़ने की कोशिश करने लगी … हाय रे … अन्दर तक बैठ गया। मन में आग पैदा होने लगी। जिस्म जलने लगा। बारिश आग लगाने लगी। हम दोनों जल उठे, गीला बदन … लण्ड पूरा अन्दर तक चूत की मालिश करता हुआ … मस्त करता हुआ … जिस्म एक दूसरे में समाने लगे। दोनों नंगे … उभारों को दबाते और मसलते हुए मस्त हो गये। धक्के और तेज हो गये …

“मजा आ गया बारिश का, चोद रे … जी भर के लगा लौड़ा … आज तो फ़ाड़ दे मेरी … “

“हां दीदी, तेरी तो मस्त चूत है … गीली और चिकनी !”

“हाय रे तेरे टट्टे, मेरी गाण्ड को थपथपा रहे है … कितना सुहाना लग रहा है … !”

“चुद ले, जोर से चुद ले … फिर पता नहीं मौका आये या ना आये … ” जोश में उसकी कमर इंजन की तरह चलने लगी। मैं चुदती रही … मन की हसरतें निकलती गई … मैं चरम बिन्दु पर पहुंचने लगी … जिस्म में कसावट आने लगी। लग रहा था कि सारा खून और सारा रस खिंच कर चूत की तरफ़ आ रहा हो …

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