लेखिका : शमीम बानो कुरैशी

फ़रदीन भाई जान ने मुझसे कहा कि आज मैं भी आप जैसा लिखूंगा, मैंने भी तो आपको चोदा है, मैं कहानी का स्वरूप लिखूंगा, बस आप उसे दिलचस्प बना देना। मेरे साथ फ़रदीन ने कैसे अपनी रंगीनियाँ बिखेरी, यह उसकी दस्तान है। वो इस तरह से अपनी आप बीती लिखते हैं…

मैं कानपुर में रहता था और अब्बू के साथ दुकान पर काम करता था। मेरे ही घर के आंगन में एक अखाड़ा भी था जहा उस्ताद उस्मान चाचा अपने पठ्ठों को पहलवानी का अभ्यास कराया करते थे। मैं तो बचपन से ही अखाड़े में बड़ा हुआ था अतः मेरा शरीर एक दम चिकना और इकहरा था। जवान होते होते तो मेरा रंग रूप और भी निखर आया था। पर उसमान चाचा हमें लड़कियों से दूर रखते थे। मेरे शरीर पर एक भी बाल नहीं था सिवाय मेरे लण्ड के आसपास नरम सी झांटों के, हां कुछ बाल मेरी बगल में भी थे। शमीम बानो के अब्बू मेरे अब्बू के बहुत पुराने दोस्त थे, उनकी दुकान पर काम करने वाला दो महीनों की छुट्टी पर चला गया था सो उन्होंने मुझे बुला लिया था। मैं वाराणसी पहुंच गया था। बानो मुझे लेने स्टेशन पर आई थी।

बानो के पति भी अपनी दुकान चलाया करते थे। उनके अब्बू ने उन्हें छत के ऊपर वाला भाग दे दिया था। उनके पति हैदराबाद से थे। मुझे भी ऊपर ही गैलरी के दूसरी तरफ़ का कमरा रहने को दे दिया था। मैं शाम को ही दुकान से फ़्री हो पाता था। फ़ारूख भाई जान और शमीम आपा शाम को रोज दारू पीते थे और पीते क्या थे, पी कर बिलकुल टुन्न हो जाते थे। कभी कभी तो वो खूब प्यार करते थे और कभी कभी तो खूब झगड़ते थे। प्यार करें या झगड़ा, उनमें गाली-गलौज का व्यव्हार बहुत होता था। यूँ तो मेरे लिये यह माहौल नया नहीं था, मेरे घर पर भी यही सब कुछ होता था। धीरे धीरे अब्दुल, फ़िरोज, अनवर आदि आपा के सभी दोस्तों से मेरा मिलना हो चुका था। तभी मुझे पता चला कि शमीम आपा तो बहुत ही रंगीन मिजाज की है, उनके दोस्तों का उनसे रिश्ता मुझे मालूम हो चुका था।

मैं आजकल काम से फ़ारिग हो कर शाम को नहा धो कर गैलरी के पास की खिड़की से शमीम आपा और उसके पति की मस्तियों को देखा करता था। आज भी मैंने उनके लिये भुना हुआ गोश्त और सलाद रख दिया था। वो भी नहा धो कर दारू पीने बैठ गये थे। पीते पीते कुछ ही देर में उन पर दारू का नशा चढ़ने लगा था और दोनों ही अश्लीलता पर उतर आये थे। फ़ारूख ने बानो को अपने ही पास सोफ़े पर बैठा लिया था और उसकी चूचियों से खेलने लगे थे।

“बानो, तेरी चूचियाँ अभी तक कड़क कैसे है, भोसड़ी की कैसी तन कर खड़ी हो जाती हैं !”

“तेरे लण्ड के लिये मैंने कुछ कहा है क्या कि इतना मस्त कैसे है, भेनचोद, कैसा इठला इठला कर मेरा दिल जीत लेता है साला !”

कुछ ही देर में दोनों एक दूसरे को नोचने खसोटने लगे। कमरे में आहें गूंजने लगी। उन्हें देख कर मेरा दिल भी पिघलने लगा। मेरा लण्ड फ़ूल कर फ़ड़क उठा। मैं कुंवारा, बेचारा यह सब देख कर मन मसोस कर रह गया। मेरा गोरा लण्ड बार बार कुलांचे मारने लगा। बानो आपा की गाण्ड को देख कर और फिर गाण्ड की चुदाई देख कर मेरा वीर्य उछल कर लण्ड से बाहर आ गया। मेरा पजामा गीला हो गया। हाय रे, बानो की मां की भोसड़ी… भेनचोद को मन करता है कि चोद डालूँ ! रात भर उनकी चुदाई को सोच सोच कर मेरा लण्ड पानी छोड़ता रहता था। आखिर कितनी बार मुठ मारूँ … यह तो उनकी रोज की बात थी।

दुकान का सामान लेने फ़ारूख भाई को दिल्ली जाना था। वो शाम की गाड़ी से दिल्ली चले गये थे।

रोज की तरह मैं रात को भुना हुआ गोश्त बानो के कमरे में रख आया था। दारू की बोतल भी बैठक में सजा दी थी। तभी बानो नहा धो कर सिर्फ़ पेटीकोट और एक बिना ब्रा के ब्लाऊज में बाहर आई। ओह ! मैं उसे देखता ही रह गया। वो तो सच में रूप की देवी थी, उसका भरा बदन, उसके उरोज, उसके मद भरे चूतड़ों के उभार, इतने पास से पहली बार देख रहा था। खिड़की से तो उस बड़े कमरे में दूर से तो उसका मद भरा हुस्न इतना कुछ नहीं नजर आता था। मुझे यूँ घूरता देख कर बानो ने सब कुछ भांप लिया। वो जानबूझ कर के मेरे बिल्कुल पास आ गई। उसके शरीर की खुशबू मेरे नथनों में समा गई। हाय! उसके शराबी गोल गोल स्तनों के उभार मेरे दिल को घायल कर रहे थे। मेरे शरीर में एक विचित्र सी सनसनी फ़ैलने लगी।

“यहाँ गिलास रख दे … और भेन चोद यूँ आंखे फ़ाड़ फ़ाड़ कर क्या देख रहा है?”

“ह… हाँ … वो कुछ नहीं… मैं चलता हूँ !”

“अरे चलता हूँ …तेरी तो … यहीं बैठ भोसड़ी के …मेरे साथ दारू कौन पियेगा … तेरा बाप ?”

“पर मैं तो नहीं पीता हूँ आपा … आप लीजिये…”

“अच्छा मत पीना, बैठ तो सही, मेरे लिये पेग बनाना … और ये बोटी तो खायेगा ना !”

मैं उसके कहने के अन्दाज से चौंक गया। उसका इशारा तो उरोज की तरफ़ था, पर बात वो गोश्त की कर रही थी। मैं झेंप गया और एक टुकड़ा उठा कर खा लिया। उसका दारू का दौर शुरू हो गया। साथ में उसका गाली-गलौज और अश्लील हरकतें भी।

“ऐ फ़रदीन, तूने कभी कोई लौंडिया चोदी है…?”

“कैसी बातें करती हो आपा… ?”

“अरे बता ना … तेरी उम्र में तो मेरे कितने ही दोस्त थे… साले सब हारामी थे … मैंने तो खूब चुदाया।”

“क्या बताऊँ, उस्ताद ने कहा है कि किसी लड़की की तरफ़ देखा भी तो वो हमारी गाण्ड मार देगा।”

“अरे वो तो लड़की के लिये बोला था ना, मैं लड़की थोड़े ही हूँ, मैं तो औरत हूँ 27 साल की !”

“ओह हाँ, आपा … फिर आप तो मेरी आपा हैं ना, कोई लड़की तो हो नहीं … पर आपा…?”

“ओये होये, मेरे भाई जान, ले पास आ जा, अब तो ठीक है ना, मेरी बोटी चूसेगा?”

उसने अपना, एक चूचा पकड़ कर मुझे देख कर हिलाया और फिर दबा दिया। मैं तो अन्दर तक हिल गया। ये क्या कह रही है बानो ! मेरा मन तो पहले ही उस पर लट्टू था। मैं शरमा गया। वो मेरे पास सरक आई और उसने अपने ब्लाऊज का बटन खोल कर उसे ढीला कर लिया। उसने अपना एक चूचा बाहर निकाल लिया।

“ले तो, समझ ले अम्मी का बोबा चूस रहा है…!”

“आपा, यह क्या कह रही हैं आप…?”

उसने कुछ नशे की झोंक में, कुछ वासना के नशे में मेरे गले में हाथ डाल कर मेरा मुख अपने बोबे पर दबा दिया। हाय रे मेरी अम्मी जान ! यह क्या… मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मेरे होंठ अनायास खुल गये और उसकी चूची पर जम गये।

“अल्लाह रे, मजा आ गया … तू तो भोसड़ी का बड़ा नमकीन है रे !”

मैं बिना पिये ही मदहोशी में था। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था, पजामे में से उभर कर मेरी शोभा बढ़ा रहा था। बानो आपा, लण्ड के आकार को देख कर ही लालायित हो उठी थी। उनके हाथ लण्ड की तरफ़ बढ़ चले थे। मेरे कड़क लण्ड को पहले तो उसने अपनी अंगुली से हिला कर देखा, वो तो टनटनाता हुआ झूल कर फिर से सीधा खड़ा हो गया। मेरे तन बदन में जैसे बिजली तड़क गई।

“आपा, मुझे क्या हो रहा है…” मेरे तन में सनसनी सी होने लगी।

“मादरचोद, तेरा लण्ड मजबूत है … कितना कड़क है…!” बानो पर नशा असर कर रहा था। मैं धीरे धीरे अपना होश खोता जा रहा था। बानो भी पेग पर पेग पिये जा रही थी। इसी बीच मुझे भी उसने एक पेग पिला दिया था। गोश्त हम दोनों ने जल्दी ही साफ़ कर दिया था। मैंने बानो को धक्का दे कर सोफ़े पर लिटाने की कोशिश की और उसके होंठों को चूसने लगा।

“अरे उठ गाण्डू, साला चढ़ा ही जा रहा है… हट जा !”

मैं जैसे होश में आ गया।

“जा वो दूसरी प्लेट गोश्त की ले आ … सारा तो खुद ही खा गया। ऐसा कर पूरा ही ले आ !”

मेरे पजामे का बटन खुल गया था और उसमें से लण्ड बाहर निकल आया था। मेरा गोरा और मोटा मस्त लण्ड देख कर बानो तो चकित रह गई। मैं गोश्त की पूरी डेगची ही उठा लाया।

“ऐ, फ़रदीन अपना पजामा उतार तो … इसकी तो मुठ मारूँ, भेन के लौड़े की !”

मेरा मन तो पहले ही विचलित हो चुका था। उसकी फ़रमाईश पर जैसे मेरा मन बाग बाग हो गया। मैंने तो पजामे के साथ साथ अपनी बनियान भी उतार दी।

“साला, हरामी… तू इतना मस्त है… पहले क्यों नहीं मिला रे… आ पास तो आ… जरा इसे देखूँ तो !”

उसने मेरा लण्ड अपनी आंखों के पास लाकर देखा। उसे सूंघा … और सर ऊंचा करके मन में उसकी सुगन्ध ली और अहसास लिया। मेरा खतना किया हुआ लौड़ा पूरा खुला हुआ था। बीच में पेशाब की नलिका को उसने हाथ से ठपकारा … मेरे लण्ड में एक मीठी सी जलन हुई। मेरा डन्डा पकड़ कर उसने जोर जोर से हिलाया और अपने मुख के ऊपर मार लिया। बानो की हालत एक मदहोश, वासना भरी, नशे में धुत्त औरत जैसी हो रही थी। मैंने भी धीरे से हाथ बढ़ा कर उसके ब्लाऊज को सामने से पूरा खोल दिया। मैंने भी उसके चुचूक को मसल कर अपना जवाब दिया। शायद उसे होश ही नहीं था। मेरा लण्ड उसके मुख में बड़ी मुश्किल से समा पाया था। उसने मेरे पोन्द को दबाया और लण्ड को अपने मुख में अन्दर बाहर करने लगी। मेरे सुपारे को जीभ से रगड़ने लगी। उसका एक हाथ अब मेरे लण्ड के डण्डे के पिछले सिरे पर आ गया और … और … वो उसे मसलने लगी, मुठ मारने लगी।

“आपा, बस करो … मैं मर जाऊंगा … निकालो बाहर !”

पर उसने एक ना सुनी … उसकी तेजी बढ़ती गई। मैं सिहर उठा, मेरी सहन शक्ति जवाब देने लगी।

“तेरी माँ को चोदू, गण्डमरी, छिनाल साली छोड़ मुझे, अरे … अरे… आह … मेरी तो चुद गई… “

उसे भला कहाँ होश था। वो तो जोंक की तरह मुझसे चिपट गई थी। उसने मेरा लण्ड जैसे निचोड़ डाला। मैं तड़प उठा … तभी मेरे लण्ड से ढेर सारा वीर्य निकल पड़ा।

“आह … साली हरामी … मैं तो मर गया … रण्डी, मेरी तो चोद दी ना साली … अब तुझे क्या खाक चोदूँगा ?”

उसके मुख से थोड़ा सा वीर्य बाहर उबल पड़ा। थोड़ा तो वो पी गई और थोड़ा उसने बाहर निकाल दिया। मेरा लण्ड मुरझाने लगा। मैं निराश हो गया कि … साली चुदने से बच गई। मैं नंगा ही बिस्तर पर जाकर बैठ गया। बानो ने वहीं प्लेट पर अपना हाथ धोया और अपना पेटीकोट उतार कर नंगी हो गई।

वो धीरे धीरे मेरे पास आई और मुस्कुरा कर बोली,”मजा तो धीरे धीरे ही आता है ना…!”

फिर उसने मुझे एक ही झटके में बिस्तर गिरा दिया और मुझे अपने नीचे दबा लिया।

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