प्रेषिका : शोभा मुरली

यह एक बिल्कुल सच्ची कहानी है ।
प्रगति एक 35 साल की शादीशुदा महिला है जिसका पति मुरली, पुलिस में कांस्टेबल है। प्रगति एक सुन्दर औरत है जो दिखने में एक 20-22 साल की लड़की की तरह दिखती है। 5’2″ ऊंचा कद, छोटे स्तन, गठीला सुडौल शरीर, रसीले होंट, काले लम्बे बाल ओर मोहक मुस्कान।

उनके एक बेटा था जो 13 साल की उम्र में भगवन को प्यारा हो गया था। इस हादसे से प्रगति को बहुत आघात लगा था। इसके बाद बहुत कोशिशों के बाद भी उनको कोई बच्चा नहीं हुआ था।

मुरली एक शराबी कबाबी किस्म का आदमी था जो की पत्नी को सिर्फ एक सेक्स का खिलौना समझता था। उसकी आवाज़ में कर्कशता और व्यवहार में रूखापन था। वोह रोज़ ऑफिस से आने के बाद अपने दोस्तों के साथ घूमने चला जाता था। पुलिस में होने के कारण उसका मोहल्ले में बहुत दबदबा था। उसको शराब और ब्लू फिल्म का शौक था जो उसे अपने पड़ोस में ही मुफ्त मिल जाते थे।

रोज़ वो शराब पी के घर आता और ब्लू फिल्म लगा कर देखता। फिर खाना खा कर अपनी पत्नी से सम्भोग करता। यह उसकी रोज़ की दिन चर्या थी।

बेचारी प्रगति का काम सिर्फ सीधे या उल्टे लेट जाना होता था। मुरली बिना किसी भूमिका के उसके साथ सम्भोग करता जो कई बार प्रगति को देह शोषण जैसा लगता था। उसकी कोई इच्छा पूर्ति नहीं होती थी ना ही उस से कुछ पूछा जाता था।
वह अपने पति से बहुत तंग आ चुकी थी पर एक भारतीय नारी की तरह अपना पत्नी धर्म निभा रही थी।
पहले कम से कम उसके पास अपना बेटा था पर उसके जाने के बाद वह बिल्कुल अकेली हो गई थी।

उसका पति उसका बिल्कुल ध्यान नहीं रखता था। सम्भोग भी क्रूरता के साथ करता था। न कोई प्यारी बातें ना ही कोई प्यार का इज़हार। बस सीधा अपना लिंग प्रगति की योनि में घुसा देना। प्रगति की योनि ज्यादातर सूखी ही होती थी और उसे इस तरह के सम्भोग से बहुत दर्द होता था। पर कुछ कह नहीं पाती थी क्योंकि पति घर में और भी बड़ा थानेदार होता था।
इस पताड़ना से प्रगति को महीने में पांच दिन की छुट्टी मिलती थी जब मासिक धर्म के कारण मुरली कुछ नहीं कर पाता था। मुरली की एक बात अच्छी थी कि वो पुलिस वाला होने के बावजूद भी पराई औरत या वेश्या के पास नहीं जाता था।

प्रगति एक कंपनी में सेक्रेटरी का काम करती थी। वह एक मेहनती और ईमानदार लड़की थी जिसके काम से उसका बॉस बहुत खुश था। उसका बॉस एक 50 साल का सेवा-निवृत्त फौजी अफसर था। वह भी शादीशुदा था और एक दयालु किस्म का आदमी था।
कई दिनों से वह नोटिस कर रहा था कि प्रगति गुमसुम सी रहती थी। फौज में उसने औरतों का सम्मान करना सीखा था। उसे यह तो मालूम था कि उसका बेटा नहीं रहा पर फिर भी उसका मासूम दुखी चेहरा उसको ठेस पहुंचाता था। वह उसके लिए कुछ करना चाहता था पर क्या और कैसे करे समझ नहीं पा रहा था। वह उसके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था।

उधर प्रगति अपने बॉस का बहुत सम्मान करती थी क्योंकि उसे अपने बॉस का अपने स्टाफ के प्रति व्यवहार बहुत अच्छा लगता था। बॉस होने के बावजूद वह सबसे इज्ज़त के साथ बात करता था और उनकी छोटी बड़ी ज़रूरतों का ध्यान रखता था। सिर्फ प्रगति ही नहीं, बाकी सारा स्टाफ भी बॉस को बहुत चाहता था।

एक दिन, जब सबको महीने की तनख्वाह दी जा रही थी, बॉस ने सबको जल्दी छुट्टी दे दी। सब पैसे ले कर घर चले गये, बस प्रगति हिसाब के कागजात पूरे करने के लिए रह गई थी। जब यह काम ख़त्म हो गया तो वह बॉस की केबिन में उसके हस्ताक्षर लेने गई। बॉस, जिसका नाम शेखर है, उसका इंतज़ार कर रहा था। उसने उसे बैठने को कहा और उसका वेतन उसे देते हुए उसके काम की सराहना की। प्रगति ने झुकी आँखों से धन्यवाद किया और जाने के लिए उठने लगी।

शेखर ने उसे बैठने के लिए कहा और उठ कर उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने प्यार से उस से पूछा कि वह इतनी गुमसुम क्यों रहती है? क्या ऑफिस में कोई उसे तंग करता है या कोई और समस्या है?

प्रगति ने सिर हिला कर मना किया पर बोली कुछ नहीं। शेखर को लगा कि ज़रूर कोई ऑफिस की ही बात है और वह बताने से शरमा या घबरा रही है। उसने प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराते हुए कहा कि उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं है और वह बेधड़क उसे सच सच बता सकती है।
प्रगति कुछ नहीं बोली और सिर झुकाए बैठी रही।
शेखर उसके सामने आ गया और उसकी ठोडी पकड़ कर ऊपर उठाई तो देखा कि उसकी आँ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here