मुझे सेक्स का कोई अनुभव नहीं था, मेरा जीवन तो जैसे सूखा रेगिस्थान जैसा था। जब जवान हुआ तो मेरा लण्ड कुलांचे भरने लगा था। पर बस यदि लण्ड ने ज्यादा मारा तो मुठ मार लिया। कभी कभी तो मैं दो पलंगो के बीच में जगह करके उसमें लण्ड फ़ंसा कर चोदता था… मजा तो खास नहीं आता था। पर हाँ ! एक दिन मेरा लण्ड छिल गया था… मेरे लण्ड की त्वचा भी फ़ट गई थी और अब सुपाड़ा खुल कर पूरा इठला सकता था।

बहुत सी लड़कियाँ मेरी क्लास में थी, पर मुझसे कोई बात नहीं करता था या कह दीजिये कि मैं ही शर्मीला था। मैंने धीरे धीरे अपनी पढ़ाई भी पूरी कर ली। 23 वर्ष का हो गया पर पानी नहीं बरसा तो नहीं बरसा। मेरा मन कुछ भी करने को तरसता रहता था, चाहे गाण्ड भी मार लूँ या मरा लूँ… या कोई चूत ही मिल जाये।

मैंने एक कहावत सुनी थी कि हर रात के बाद सवेरा भी आता है… पर रात इतनी लम्बी होगी इसका अनुमान नहीं था। कहते हैं ना धीरज का फ़ल मीठा होता है… जी हां सच कह रहा हूँ… रात के बाद सवेरा भी आता है और बहुत ही सुहाना सवेरा आता है… फ़ल इतना मीठा होता है कि आप यकीन नहीं करेंगे।

मैं नया नया उदयपुर में पोस्टिंग पर आया था। मैं यहाँ ऑफ़िस के आस पास ही मकान ढूंढ रहा था। बहुत सी जगह पूछताछ की और 4-5 दिनो में मुझे मकान मिल गया। हुआ यूं कि मैं बाज़ार में किसी दुकान पर खड़ा था। तभी मेरी नजर एक महिला पर पड़ी जो कि अपने घूंघट में से मुझे ही देख रही थी। जैसे ही मेरी नजरें उससे मिली उसने हाथ से मुझे अपनी तरफ़ बुलाया। पहले तो मैं झिझका… पर हिम्मत करके उसके पास गया।
‘जी… आपने मुझे बुलाया…?’
‘हां… आपणे मकान चाही जे… ।’
‘ज़ी हाँ… कठे कोई मिलिओ आपणे’

‘मारा ही मकाण खाली होयो है आज… हुकुम पधारो तो बताई दूं’
‘तो आप आगे चालो… मूं अबार हाजिर हो जाऊ’
‘हाते ही चालां… तो देख लिओ… ‘
‘आपरी मरजी सा… चालो ‘

मैंने अपनी मोटर साईकल पर उसे बैठाया और पास ही मुहल्ले में आ गये। मुझे तुरन्त याद आ गया… यह एक बड़ी बिल्डिंग है… उसमें कई कमरे हैं। पर वो किराये पर नहीं देते थे… इनकी मेहरबानी मुझ पर कैसे हो गई। मैंने कमरा देखा, मैंने तुरन्त हां कह दी।

सामान के नाम पर मेरे पास बस एक बेडिंग था और एक बड़ा सूटकेस था। मैं तुरन्त अपनी मोटर साईकल पर गया और ऑफ़िस के रेस्ट हाऊस से अपना सामान लेकर आ गया। मैं जी भर कर नहाया। फ़्रेश होकर कमरे में आकर आराम करने लगा। इतने में एक पतली दुबली लड़की मुस्कराती हुई आई। जीन्स और टॉप पहने हुए थी। मैं इतनी सुन्दर लड़की को आंखे फ़ाड़ फ़ाड़ कर देखने लगा, उठ कर बैठ गया।
‘जी… आप कौन हैं… किससे मिलना है?’
वो मेरी बौखलाहट पर हंस पडी… ‘हुकुम… मैं कमल हूँ… ‘

आवाज से मैंने पहचान लिया… यह तो वही महिला थी। मैं भी हंस पड़ा।
‘आप… तो बिल्कुल अलग लग रही हैं… कोई छोटी सी लड़की !’
‘खावा रा टेम तो हो गयो… रोटी बीजा लाऊं कई… ‘

मेरे मना करने पर भी वो मेरे लिये खाना ले आई। मेवाड़ी खाना था… बहुत ही अच्छा लगा।

बातचीत में पता चला कि उसकी शादी हो चुकी है और उसका पति मुम्बई में अच्छा बिजनेस करता था। उसके सास और ससुर सरकारी नौकरी में थे।
‘आपणे तो भाई साहब ! मेरे खाने की तारीफ़ ही नहीं की !’
‘खाना बहुत अच्छा था… और आप भी बहुत अच्छी हो… !’
‘वाह जी वाह… यह क्या बात हुई… खैर जी… आप तो मने भा गये हो !’ कह कर मेरे गाल पर उसने प्यार कर लिया।

मैं पहले तो सकपका गया। फिर मैंने भी कहा,’प्यार यूँ नहीं… आपको मैं भी करूँ !’

उसने अपना गाल आगे कर दिया… मैंने हल्के से गाल चूम लिया। जीवन में मेरा यह प्रथम स्त्री स्पर्श था। वो बरतन लेकर इठलाती हुई चली गई। मुझे समझ में नहीं आया कि यह क्या भाई बहन वाला प्यार था… शायद… !!!

शाम को फिर वो एक नई ड्रेस में आई… घाघरा और चोली में… वास्तव में कमल एक बहुत सुन्दर लड़की थी। चाय लेकर आई थी।
‘भैया… अब बोलो कशी लागू हूँ…?’
‘परी… जैसी लग रही हो…!’
‘तो मने चुम्मा दो… !’ वो पास आ गई…

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here