यह कहानी से आगे की कहानी है। पाठकों से अनुरोध है कि इसको पढ़ने से पहले

प्रगति के पिताजी को मास्टरजी की नीयत पर शक हो चला था। वर्ना वे सिर्फ प्रगति को अकेले में अपने घर में पढाने के लिए क्यों बुलाते। उन्हें यह भी समझ आ गया कि प्रगति शरीर से अब जवान हो चली थी पर मन अभी भी बच्चों जैसा था। इस लड़कपन की उम्र में अक्सर लड़कियाँ भटक जाती हैं क्योंकि उनके शरीर में जो भौतिक और रासायनिक बदलाव आ रहे होते हैं, उनके चलते वे आसानी से लुभाई जा सकती हैं। उन्हें अपने जिस्म की ज़रूरतें का अहसास होने लगता है और वे समझ नहीं पाती कि उन्हें क्या करना चाहिए। उनके मन में माँ-बाप के दिए दिशा -निर्देश, समाज के लगाये बंधनों और संसकारों की बंदिश एक तरफ रोक रही होती है तो दूसरी तरफ उनके शरीर में उपज रही नई उमंगों और तरंगों का ज्वार-भाटा उन्हें तामसिकता की तरफ खींच रहा होता है। वे इस दुविधा में फँसी रहती हैं कि उनके लिए क्या उचित है और क्या नहीं।

प्रगति के पिताजी ने इसी में भलाई समझी कि उन्हें यह गाँव छोड़ कर कहीं और चले जाना चाहिए जहाँ प्रगति और मास्टरजी का मेल न हो सके और प्रगति नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर सके। वे चाहते थे कि प्रगति पढ़-लिख कर इस काबिल बन जाए कि वह अपना और अपने परिवार का ध्यान रख सके। उन्होंने निश्चय कर लिया कि इस गाँव को छोड़ने का समय आ गया है। भाग्यवश, उनके एक मित्र का हैदराबाद से सन्देशा आ गया कि वहाँ एक सरकारी अफसर को एक ऐसे परिवार की ज़रुरत है जो उसके घर का काम, बच्चे की देख-रेख, बगीचे का ध्यान और ड्राईवर का काम, सभी कुछ कर सके। इसके एवज़ में वह परिवार को घर के अलावा, बच्चों के स्कूल का दाखिला, स्कूल का खर्चा और अच्छी तनख्वाह देने को तैयार है। उसे बस एक ईमानदार और संस्कारी परिवार की ज़रुरत है।

यह सन्देशा पा कर प्रगति के पिताजी खुश हो गए और उन्होंने अपने मित्र को अपनी तरफ से हामी भर दी। कुछ दिनों बाद वहाँ से भी मंजूरी आ गई और जैसे ही स्कूलों की छुट्टी शुरू हुई, प्रगति अपने परिवार सहित हैदराबाद रवाना हो गई। जाते वक़्त वह मास्टरजी से बहुत मिलना चाहती थी पर पिताजी ने उस पर कड़ा अंकुश लगा रखा था। सो बेचारी मन मसोस कर रह गई और एक अनजान शहर की तरफ चल पड़ी। उधर मास्टरजी भी एक आखरी बार प्यारी प्रगति से हम-बदन होना चाहते थे पर उनकी कोई तरकीब काम नहीं आई और वे भी अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाए। न जाने उन्हें प्रगति जैसी कोई और लड़की मिलेगी या नहीं। उन्होंने अपनी खोज शुरू कर दी।

प्रगति ने हैदराबाद में जब अपना नया घर देखा तो वह ख़ुशी से फूली नहीं समाई। उसने सपने में भी एक ऐसे घर की कल्पना नहीं की थी। उसके सभी घर वाले भी बहुत खुश थे। घर एक बहुत बड़ी कॉलोनी में था जो कि सिर्फ वरिष्ठ सरकारी अफसरों के लिए थी। कॉलोनी में सभी ज़रुरत की सहूलियतें मौजूद थीं- दूकानें, पोस्ट-ऑफिस, डिस्पेंसरी, बैंक, खेल के मैदान, झूले वगैरह। बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे, वातावरण ख़ुशी से चहक रहा था।

जिस अफसर के घर में उन्हें रहना था उसका नाम शालीन था। उसके साथ उसकी पत्नी मयूरी और एक आठ साल का बेटा आकाश रहता था। घर बहुत सुन्दर था और हर तरह की ज़रूरतों के सामान से लैस था। उनके नौकरों का घर भी अच्छा था और उसमें एक कमरा, रसोई और बाथरूम था। शालीन ने उनके कमरे में रंगीन टीवी लगवा दिया था और बच्चों की पढ़ाई के लिए मेज़-कुर्सी का अलग से प्रबंध था। इस कारण कमरा थोड़ा छोटा लग रहा था।

शालीन ने प्रगति के पिताजी को कह दिया था कि अगर उनको जगह कम लगे तो बच्चे उनके घर में सो सकते हैं। प्रगति के पिताजी शालीन के इस मानविक रुख से बहुत प्रभावित हुए और आभार भरी नज़रों से उन्हें धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं दे सके।

कुछ ही दिनों में प्रगति का परिवार और शालीन का परिवार एक दूसरे को अच्छे लगने लगे और उनमें एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर का भाव पनप गया। मयूरी भी प्रगति के सभी घरवालों के साथ प्यार से पेश आती और उनको अपने नए घर को बसाने में हर तरह की मदद करती। आकाश भी प्रगति और उसकी दोनों बहनों, अंजलि और दीप्ति, के साथ घुल-मिल गया था और उन्हें अपने खिलौनों से खेलने देता था। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

प्रगति के सभी घरवाले हैदराबाद आने के निर्णय से खुश थे और वे कोई ऐसी हरकत नहीं करना चाहते थे जिससे शालीन के परिवार का कोई भी सदस्य उनसे नाखुश हो। प्रगति की माँ घर का सारा काम बड़ी उत्सुकता से करती, उसके पिताजी बगीचे का ध्यान रखते और बाहर का कोई भी काम ख़ुशी और तत्परता से करते। प्रगति, अपनी बहनों के साथ मिलकर घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बटाती और फुर्सत होने पर आकाश के साथ खेलती।

समय अच्छा बीत रहा था।

धीरे धीरे दिन बीतते गए और मौसम ने करवट बदली। सर्दियों के दिन आने लगे। मयूरी ने उनके लिए गरम कपड़ों का इंतजाम किया। अपने और शालीन के पुराने कपडे प्रगति के माँ-बाप को दिए और आकाश के पुराने कपड़े अंजलि और दीप्ति के काम आये। प्रगति के लायक गरम कपड़े नहीं थे सो मयूरी ने उसे अपने घर में रहने की इजाज़त दे दी क्योंकि वहाँ हीटर लगा हुआ था।

अब प्रगति लगभग पूरा समय शालीन के घर में ही रहने लगी। सिर्फ खाना खाने और स्कूल जाते वक़्त वह घर से बाहर निकलती। मयूरी को प्रगति के घर में रहने से काफ़ी आराम हो गया था। वह उसके सारे काम कर देती और मयूरी को ठाठ से रहने देती।

आकाश को भी अपनी नई “दीदी” से लगाव हो गया था और वे दोनों काफ़ी समय एक साथ गुज़ारने लगे थे।

एक दिन शालीन दफ्तर से देर से घर आया। उसे दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम और भी करना था। सबके सोने का समय हो गया था सो उसने खाना खाने के बाद मयूरी और आकाश को सोने को कह दिया और वह पढ़ाई के कमरे में चला गया। उसे नहीं पता था वहाँ ज़मीन पर प्रगति सोई हुई थी। खैर, उसे सोता छोड़ कर वह अपने लैपटॉप पर काम करने लगा। जहाँ वह बैठा था, वहाँ से प्रगति सोती हुई साफ़ दिखाई दे रही थी।

यौवन की दहलीज पर पाँव रख चुकी एक खुश लड़की जिस तरह चिंता-मुक्त स्थिति में सोती है वैसे ही प्रगति शालीन से कोई एक गज दूर सो रही थी। उसके पाँव शालीन की तरफ थे और उसने अपने दाईं ओर करवट ले रखी थी जिस कारण उसकी पीठ शालीन की तरफ थी।

ठण्ड बढ़ रही थी सो शालीन ने उठ कर प्रगति को कम्बल उढ़ा दिया और हीटर चालू कर दिया। ऐसा करने से प्रगति ने नींद ही नींद में करवट ली और वह सीधी हो कर सोने लगी। शायद वह कोई अच्छा सपना देख रही होगी क्योंकि उसके अधरों पर हलकी सी मुस्कान खेल रही थी और उसके स्तन साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। शालीन का ध्यान अपने काम से हठ कर प्रगति के स्तनों पर टिक गया।

शालीन अपने नाम-स्वरूप एक शांत स्वभाव का आदमी था जो अपने व्यवसाय में बहुत सफल और उन्नत था। उसके दफ्तर में सभी उसे भविष्य का प्रबन्ध-निदेशक समझते थे। वह हृदय से कृपालु और उदार प्रवर्ति का इंसान था तथा सभी वर्गों के लोगों के प्रति उसमें आदर भाव व्याप्त था।

वैसे वह करीब चालीस वर्ष का था लेकिन दिखने में कोई भी उसे तीस-बत्तीस का समझ सकता था। खेल-कूद में रूचि, नियमित रूप से व्यायाम और हलके आहार के कारण उसने अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखा हुआ था। उसके चेहरे पर सदैव एक हलकी मुस्कान और आत्मविश्वास झलकता था। वह एक आदर्श पति और पिता था जिसका सारा संसार मयूरी और आकाश के चारों तरफ घूमता था। उनके लिए वह अपने दफ्तर से भी झगड़ा मोल ले सकता था।

शालीन ने कुरता-पायजामा और ऊपर से गरम शॉल ले रखा था। प्रगति ने मयूरी की एक पुरानी ड्रेस पहनी हुई थी जो उसके लिए काफ़ी ढीली थी। ठण्ड से बचने के लिए, उसने नीचे एक बनियान पहन रखी थी। शालीन की नज़रें यह नहीं जान पा रहीं थीं कि उसने चड्डी पहनी है या नहीं।

धीरे धीरे शालीन को प्रगति के अपने नजदीक होने का अहसास होने लगा और उसका ध्यान दफ्तर के काम से बिलकुल हट गया। वह एक-टक प्रगति को देखता रहा और उसके रूप को सराहने लगा। उसके अधखुले होटों से सफ़ेद दांतों की झलक, उसकी साँसों की सरसराहट और उसके साथ उसके वक्ष की मंद-मंद हरकत शालीन को विचलित कर रही थी। उसका मन डोल रहा था और शादी के बाद से पहली बार उसे किसी पराई लड़की को देख कर काम-वासना की अनुभूति हो रही थी।

अचानक हीटर की गर्मी के कारण, प्रगति ने सोते सोते ही अपनी टांगों से कम्बल को दूर कर दिया और एक गहरी सांस लेकर सोने लगी। शालीन को मानो करंट लग गया। प्रगति की टांगें उस ढीली ड्रेस में से घुटनों तक बाहर झाँक रहीं थीं। उसके स्तन सिर्फ बनियान के कारण छुपे हुए थे।

शालीन का शरीर अंगड़ाई लेने लगा और उसका मन तामसिकता की रेखा के पास आ गया। उसे भी गर्मी सी लगने लगी और उसने अपना शॉल उतार दिया। उसको पायजामे में अपने लिंग के वज़न का अहसास होने लगा।

उसने यकायक उठकर हीटर का रुख प्रगति से दूर कर दिया और उसके पास रखी चटाई पर बैठ गया। कांपते हाथों से उसने प्रगति के कम्बल को उठा कर उढ़ाने की कोशिश की पर कम्बल प्रगति की टांगों में फंसा हुआ था। उसे छुड़ाने की कोशिश में प्रगति की आँख खुल गई और अपने पास शालीन को देख कर वह अचंभित हो गई और फिर शरमा गई।

शालीन भी घबरा सा गया पर अपने आप को सँभालते हुए बोला,”तुम्हें उढ़ा रहा था … ठण्ड लग जायेगी .. “

प्रगति कुछ नहीं बोली, पर उसका हाव-भाव बहुत कुछ कह गया। एक तो उसने कोई आपत्ति या संकोच नहीं जताया और दूसरे उसने शालीन को शर्मिंदा या कसूरवार महसूस नहीं होने दिया। उसे मास्टरजी के साथ बिठाये पल याद आ गए और उसके चेहरे पर शर्म, उत्सुकता और ख़ुशी का एक अद्भुत मिश्रण छा गया। उस चेहरे को देख कर शालीन की घबराहट दूर हुई और उसने मन ही मन चैन की सांस ली। उसे डर था कि कहीं प्रगति चिल्ला ना दे।

“तो फिर उढ़ा दीजिये !” प्रगति ने आखिर कह ही दिया और आँखें मूँद लीं।

शालीन ने उसे कम्बल से उढ़ा दिया। वह उठने ही वाला था कि प्रगति ने करवट बदली और उसकी पीठ और चूतड़ फिर से उघड़ गए। शालीन ने हिम्मत करके कम्बल को प्रगति के जिस्म से ढीला किया और दोबारा उढ़ा कर कम्बल को उसके शरीर के नीचे दबाने लगा जिससे वह फिर से ना उघड़े। ऐसा करते वक़्त उसके हाथों और उँगलियों ने पहली बार प्रगति के शरीर का स्पर्श किया और उसको यह बहुत ही कामोत्तेजक लगा।

शायद प्रगति को भी शालीन का स्पर्श अच्छा लगा। उसने एक ठंडी सांस ली और सोने का नाटक करने लगी।

शालीन अपने दफ्तर के काम से पूरी तरह विरक्त हो चुका था। उसका दिमाग सिर्फ प्रगति के मांसल शरीर और अपने मन में उपज रहे कामुक विचारों पर केन्द्रित था। अचानक उसमें प्रगति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की लालसा जागने लगी और वह काम-वासना के लोभ में लिप्त होने लगा।

जब आदमी काम-वासना में लिप्त हो जाता है तो उसका विवेक सात्विक विचारों का त्याग कर देता है और उसे सिर्फ एक ही लक्ष्य दिखता है …. अपनी कामाग्नि बुझाने का !

शालीन ने थोड़ी और हिम्मत दिखाई और प्रगति को ऐसे छूने लगा मानो उसका कम्बल ठीक कर रहा हो।

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