मास्टरजी और प्रगति गुसलखाने में गए और मास्टरजी ने उसको नहलाना शुरू किया। बालों को गीला करके शैंपू किया और फिर उसके बदन पर साबुन लगा कर उसके अंग अंग को मलने लगे।

मास्टरजी के हाथों को उसका साबुन से सना मांसल जिस्म बहुत अच्छा लग रहा था। उनके हाथ फिसल फिसल कर उसके शरीर पर घूम रहे थे और उसके स्तनों और चूतड़ों पर विशेष दिलचस्पी दिखा रहे थे।
उन्होंने उसको अपने बाजू ऊपर उठाने को कहा और उसकी काखों और कमर पर साबुन मलने लगे। फिर उन्होंने उसे घुमा कर उसकी पीठ अपनी तरफ कर ली और पीठ, चूतड़ और टांगों पर हाथ चलाने लगे।

प्रगति को मज़ा आ रहा था। मास्टरजी ने नीचे बैठ कर उसकी टांगें धोनी शुरू कीं और फिर साबुन के हाथों से योनि को विशुद्ध करने लगे।

प्रगति को अब ज्यादा गुलगुली होने लगी और उसने अपनी टांगें बंद कर लीं।
मास्टरजी का हाथ उसकी टांगों के बीच ही जकड़ा गया।
वे जकड़ी हुई टांगों के बीच अपनी हथेली सहलाने लगे। दोनों को मज़ा आ रहा था। मास्टरजी का लंड उत्सुक होने लगा। प्रगति की योनि भी मचलने लगी!!!!

मास्टरजी ने प्रगति को शावर से नहला दिया और अब खुद नहाने लगे।

प्रगति ने उनसे साबुन ले लिया और उनको नहलाने लगी। पूरे बदन पर साबुन लगाकर रगड़ कर साफ़ करने लगी पर उनके लिंग को शर्म के मारे नहीं छुआ।
मास्टरजी व्याकुल हो गए और उसके हाथों को अपने लिंग पर ले जाकर छोड़ दिया। उनका लिंग शिथिलता और कड़कपन के बीच की अवस्था में था।

यह वह अवस्था होती है जिसमें पुरुष को लंड चुसवाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता है क्योंकि उसका पूरा लंड आसानी से लड़की के मुँह में चला जाता है। लड़की को भी लंड की यह अवस्था अच्छे लगती है क्योंकि एक तो मुँह में पूरा ले पाती है दूसरे जब लंड उसके मुँह में बड़ा होने लगता है तो एक अजीब सा ख़ुशी का अहसास होता है। उसे लगता है मानो वह अपने मुँह से लिंग में स्फूर्ति और शक्ति डाल रही है। मानो किसी मूर्छित इंसान में प्राण डाल रही हो। उसे अपनी इस योग्यता पर नाज़ होता है और वह अपने आप को शक्तिदायक और जीवनदायक समझने लगती है।

एक तरह से यह सच भी है। एक लड़की (या औरत) कितनी आसानी से आदमी में निश्चय, संकल्प, शक्ति, वीरता और पौरुष जैसे गुणों का जनन कर देती है, वह उसके लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है और उसकी ख़ातिर वह कोई भी मुकाम हासिल करने को तैयार हो जाता है और सफल भी होता है। शायद इसीलिये स्त्री को शक्ति का रूप माना जाता है।
आदमी भले ही अपना लंड खड़ा ना कर सके, औरत उसका लंड झट से खड़ा करवा सकती है। इससे बढ़ कर और क्या शक्ति हो सकती है।

खैर, मास्टरजी ने लंड को प्रगति के मुँह की तरफ पहुँचाया और प्रगति को निहारने लगे। उनकी आँखों से अनुरोध बरस रहा था।

प्रगति समझदार थी और उसने आधे गदराये हुए लंड को मुँह के हवाले कर दिया।
मास्टरजी का अधमरा लंड लचीला, छोटा और नर्म था सो प्रगति को पूरा लंड मुँह में लेने में कठिनाई नहीं हुई।

मास्टरजी का लंड, जैसे सपेरे का नाग टोकरी में लोटा होता है, प्रगति के मुँह में आसीन हो गया। जब प्रगति ने उसको जीभ से सहलाना और मसलना शुरू किया तो जैसे नाग की टोकरी का ढक्कन खोल दिया हो, मास्टरजी का लंड उठने लगा और अपने लचीलेपन, छुटपन और नम्रता को छोड़ कर कठोर और विराट रूप धारण करने लगा।

प्रगति को उसके मुँह में अंगडाई लेता हुआ और लिंग से लंड बनता हुआ मर्दाना अंग बहुत अच्छा लग रहा था। उसने मुँह से उसे चोदना शुरू किया।

मास्टरजी भी यही चाहते थे। नहाने के बाद वे प्रगति के साथ एक लम्बा सम्भोग करना चाहते थे। इसके लिए उनके लंड का एक और बार परमोत्तेजित होना मददगार साबित होना था। ऐसा होने के बाद उनका लंड आसानी से अगला विस्फोट नहीं करेगा और वे जितनी देर चाहें प्रगति को तरह तरह के आसनों में चोद सकेंगे।

यह सम्भोग की अवधि बढ़ाने का एक सरल उपाय है। पहले एक बार हस्त-मैथुन करके लावा उगल दो और उसके बाद लंड चुसवा कर उसे खड़ा करवाओ और फिर सम्भोग करो। इससे मर्द को तीन तरह का सुख (हस्त-मैथुन, मुख-मैथुन और सम्भोग) भी मिलता है और वह देर तक चुदाई भी कर सकता है।

प्रगति की मदद के तौर पर उन्होंने उसके मुँह में धक्कम-पेल शुरू कर दी और थोड़ी ही देर में वे उसके मुँह में बरसने लगे।
बरसने से पहले उन्होंने आख़री धक्का ऐसा लगाया कि उनका लंड प्रगति के कंठ में गहराई तक चला गया।

अब तो प्रगति को उनकी इस करतूत का पूर्वानुमान सा था। जब तक उनका लंड हिचकियाँ भर रहा था प्रगति ने उसे मुँह में ही पकड़े रखा और उसको पूरा निचोड़ कर ही बाहर आने दिया।

मास्टरजी को प्रगति पर बहुत मान होने लगा था। उसकी सेक्स प्रक्रियाओं में निपुणता का सारा श्रेय वे अपने आप को दे रहे थे। मास्टरजी ने एक बार फिर प्रगति पर पानी डाल कर उसे ताजा कर दिया और खुद भी नहा लिए।

मास्टरजी और प्रगति नहाने के बाद बाहर आये तो दोनों को भूख लग रही थी।

मास्टरजी ने प्रगति को अपना एक साफ़ कुर्ता पहनने को दे दिया। कुर्ता उसके लिए काफी ढीला था और कन्धों से नीचे ढलक रहा था। आस्तीन भी काफी बड़ी थीं। आस्तीन को तो ऊपर चढ़ा लिया पर कन्धों से ढलकता हुआ कुर्ता पहन कर वह बहुत कामुक लग रही थी। गीले बाल और कुर्ते के नीचे नंगी होने से उसके आकर्षण में चार चाँद लग गए थे…

मास्टरजी ने उसको गले लगा कर प्यार किया और खाने की मेज़ पर ले गए।

मास्टरजी ने सिर्फ लुंगी पहन रखी थी। दोनों ने खाना खाया। मास्टरजी ने हलके खाने का बंदोबस्त किया था जिससे खाने के बाद भारीपन और आलस्य न महसूस हो और वे अपने जिस्म की प्यास अच्छे से बुझा सकें।

उन्होंने प्रगति को भी हल्का खाना खाने का सुझाव दिया और वह उनकी बात मान रही थी। खाने के बाद दोनों बिस्तर पर लेट गए और थोड़ी देर विश्राम किया।
विश्राम के वक़्त मास्टरजी पोले पोले हाथों से प्रगति के पेट और पीठ को नाखूनों से खुरच रहे थे। वे प्रगति को और अपने आपको थोड़ा बहुत उत्तेजित ही रखना चाहते थे।

कुर्ते के ऊपर से मास्टरजी की नुकीली उँगलियाँ उसके बदन में सरसराहट पैदा कर रही थीं। उसे बड़ा अच्छा लग रहा था। उसने भी मास्टरजी के बदन पर हाथ चलाने शुरू कर दिए।

मास्टरजी प्यार से उसके बालों में हाथ फेरने लगे और बिल्कुल हल्के हाथ उसके वक्ष पर चलाने लगे। धीरे धीरे कुर्ते में से प्रगति का बदन उघड़ने लगा और कुर्ता उसकी गर्दन के पास इकठ्ठा हो गया। नीचे से तो वैसे ही नंगी थी।

मास्टरजी ने उसे सीधा लिटा दिया। उसकी टाँगें थोड़ी खोल दीं और घुटने उठा कर मोड़ दिए। उसके सिर के नीचे से तकिया हटा कर उसको बिस्तर पर सपाट कर दिया। अब वह बिस्तर पर लेटी हुई छत को देख रही थी।

मास्टरजी ने लुंगी उतारी और अपने आपको चोदने की हालत में ले आये। उनका लंड अभी शिथिल ही था। पर उन्होंने उस लटके हुए लिंग के साथ ही प्रगति की चूत के द्वार के ऊपर और उसके इर्द गिर्द अपना सुपाड़ा घुमाने लगे।
अपना वज़न अपने हाथों पर रखा हुआ था, उनका मुँह प्रगति के मम्मों के ऊपर और उनका निचला हिस्सा दंड लगाने की हालत में इस तरह था कि वे लंड से नाभि से लेकर जाँघों तक छू सकते थे।

इस अवस्था में लंड उसके निचले भाग से रगड़ रहे थे और मुँह से मम्मों को एक-एक करके चूस रहे थे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने घुटने बिस्तर पर टिका दिए और हाथों और घुटनों के बल आगे बढ़ते हुए अपने उभरते लिंग को मम्मों के बीच में लगा दिया। फिर अपने हाथों से दोनों मम्मों का लिंग के दोनों तरफ जोड़ दिया।

अब उनका लिंग मम्मों के बीच में था और उन्होंने मम्मों को चोदने जैसी हरकत शुरू की। रास्ते में कुर्ते की रुकावट हो रही थी सो मास्टरजी ने उसका सिर उठाकर कुर्ता गले में से निकाल दिया। अब वह पूरी नंगी थी।

आगे जाते वक़्त उनका सुपाड़ा प्रगति की ठोड़ी तक जाता। मास्टरजी के लौड़े में गर्माइश आ रही थी और वह सूजने लग रहा था। उन्होंने अपने आप को थोड़ा और ऊपर सरकाया जिससे आगे जाते वक़त अब उनका लंड प्रगति के होटों तक पहुँच रहा था।
पर क्योंकि प्रगति का सिर सीधा था वह उसे मुँह में नहीं ले पा रही थी। उसने पास रखे तकिये को सिर के नीचे रख लिया और अगली बार जब लंड आगे को आया प्रगति के मुँह ने सुपाड़े को पकड़ लिया। प्रगति ऐसे मुस्कराई जैसे कोई खेल जीत लिया हो।

मास्टरजी ने जब पीछे की तरफ लंड खींचा तो प्रगति ने आसानी से जाने नहीं दिया। मास्टरजी को यह खेल पसंद आया।

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