किसी न किसी कारणवश मास्टरजी प्रगति से अगले 4-5 दिन नहीं मिल सके। प्रगति कोई न कोई बहाना करके उन्हें टाल रही थी। बाद में मास्टरजी को पता चला कि प्रगति को मासिक धर्म हो गया था।

वे खुश हो गए। कामुकता के तैश में वे यह तो भूल ही गए थे कि उनकी इस हरकत से प्रगति गर्भ धारण कर सकती थी। इस परिणाम के महत्व को सोचकर उनके रोंगटे खड़े हो गए।
वे ऐसी गलती कैसे कर बैठे। अपने आप को भाग्यशाली समझ रहे थे कि वे इतनी बड़ी भूल से होने वाले संकट से बच गए।

उन्होंने तय किया ऐसा जोखिम वे दोबारा नहीं उठाएँगे।

उन्हें पता था कि आम तौर पर लड़की के मासिक धर्म शुरू होने से लगभग दस दिन पहले और लगभग दस दिन बाद तक का समय गर्भ धारण के लिए उपयुक्त नहीं होता। मतलब कि इस दौरान किये गए सम्भोग में लड़की के गर्भवती होने की सम्भावना कम होती है। कुछ लोग इसे सुरक्षित समय समझ कर बिना किसी सावधानी (कंडोम) के सम्भोग करना उचित समझते हैं।

वैसे कई बार उनकी यह लापरवाही उन्हें महंगी पड़ती है और लड़की के गर्भ में अनचाहा बच्चा पनपने लगता है। अगर लड़की अविवाहित है तो उस पर अनेक सामाजिक दबाव पड़ जाते हैं जिससे उसके तन और मन दोनों पर दुष्प्रभाव होता है।

एक गर्भवती के लिए ऐसे दुष्प्रभाव बहुत हानिकारक होते हैं। गर्भ धारण तो एक लड़की तथा उसके परिवार वालों के लिए सबसे ज्यादा खुशी का मौका होना चाहिए न कि समाज से आँखें चुराने का।

मास्टरजी ने भगवान का दुगना शुक्रिया अदा किया। एक तो उन्होंने प्रगति को गर्भवती नहीं बनाया दूसरे उन्हें प्रगति के मासिक धर्म की तारीख पता चल गई जिससे वे उसके साथ सुरक्षित सम्भोग के दिन जान गए।
जिस दिन मासिक धर्म शुरू हुआ था उस दिन से दस दिन बाद तक प्रगति गर्भ से सुरक्षित थी। यानि अगले पांच दिन और।

यह सोच सोच कर मास्टरजी फूले नहीं समा रहे थे कि अगले पांच दिनों में वे प्रगति के साथ निश्चिन्तता के साथ मनमानी कर पाएंगे। आज प्रगति पांच दिनों के बाद आने वाली थी। यह सोचकर उनके मन में लड्डू फूट रहे थे और उनका लंड प्रत्याशित आनंद से फूल रहा था।

वहाँ प्रगति भी मास्टरजी से मिलने के लिए बेक़रार हो रही थी। उसके भोले भाले जवान जिस्म को एक नया नशा चढ़ गया था। जिन अनुभवों का उसके शरीर को अब तक बोध नहीं था वे उसके तन मन में खलबली मचा रहे थे।
अचानक उसे सामान्य मनोरंजन की चीज़ों से कोई लगाव ही नहीं रहा। गुड्डे-गुडियाँ, आँख-मिचोली, ताश, उछल-कूद वगैरह जो अब तक उसे अच्छे लगते थे, मानो नीरस हो गए थे।
उसे अपनी देह में नए नए प्रवाहों की अनुभूति होने लगी थी। उसकी इन्द्रियाँ उसे छेड़ती रहती थीं और उसका मन मास्टरजी के घर में गुज़रे क्षणों को याद करता रहता।

वह अपने आप को शीशे में ज्यादा निहारने लगी थी। उसके हाथ अपने यौवन के प्रमाण-रूपी स्तनों और स्पर्श की प्यासी योनि को सहलाने में लगे रहते।

उसने पिछले 4-5 दिनों में अपनी छोटी बहनों को अच्छे से पटा लिया था। मास्टरजी की मिठाई के आलावा उसने उनके लिए तरह तरह की चीज़ें बना कर दीं और उनको अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ खेल-कूद की आज़ादी दे दी।
बदले में वह उनसे बस इतना चाहती थी कि मास्टरजी के यहाँ उसकी पढ़ाई की बात वे माँ-बापू को न बताएं। उनमें यह षडयंत्र हो गया कि एक दूसरे की शिकायत नहीं करेंगे और माँ-बापू को कुछ नहीं बताएँगे।

प्रगति खुश हो गई। उसकी भोली बहनों को उसकी असली इच्छा पता नहीं थी। होती भी कैसे…? उनके शरीर को किसी ने अभी तक प्रज्वलित जो नहीं किया था। वे अभी बहुत छोटी थीं।

प्रगति को मास्टरजी ने 12 बजे का समय दिया था जिससे वे उसके साथ आराम से 4-5 घंटे बिता सकते थे। आज शनिवार होने के कारण स्कूल की छुट्टी थी।

प्रगति ने जल्दी जल्दी घर का ज़रूरी काम निपटा दिया और दोपहर का खाना भी बना दिया जिससे अंजलि और छुटकी को उसके देर से घर वापस लौटने से कोई समस्या न हो।

11 बजे तक सब काम पूरा करके वह नहाने गई और अच्छी तरह से स्नान किया। फिर तैयार हो कर बालों में चमेली के फूलों की वेणी लगा कर ठीक समय पर अपने गंतव्य स्थान के लिए रवाना हो गई।

उधर मास्टरजी ने पहले की तरह सारी तैयारी कर ली थी। इस बार, ज़मीन के बजाय उन्होंने अपने बिस्तर पर प्रबंध किया था।

वे जानते थे कि पहली पहली बार जब किसी लड़की को घर लाओ तो उसे बेडरूम में नहीं ले जाना चाहिए क्योंकि ज्यादातर लड़कियाँ वहाँ जाने से कतराती हैं।
शुरू शुरू की मुलाक़ात में लड़की को ऐसा प्रतीत नहीं होना चाहिए कि तुम्हारा इरादा सम्भोग करने का है। यह बात अगर वह जानती भी हो तो भी पहला मिलन बेडरूम के बाहर होना उसके लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर ठीक होता है। वह अपने आपको सुरक्षित महसूस करती है!!

जब एक बार शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो जाएँ फिर फ़र्क नहीं पड़ता!!

अब तो प्रगति के साथ उनके संबंधों में कोई भेद नहीं रह गया था। अब वे उसे निःसंकोच अपनी शय्या पर ले जा सकते थे। उन्होंने ऐसा ही किया। साथ ही उन्होंने एक कटोरी में शहद डाल कर सिरहाने के पास छुपा दिया। एक छोटा तौलिया और गुनगुने पानी की छोटी बालटी भी पास में रख ली। उनका इरादा प्रगति को एक नई प्रक्रिया सिखाने का था।

प्रगति ठीक समय पर मास्टरजी के घर पहुँच गई और एक पूर्वानुमानित तरीके से चुपचाप पीछे के दरवाज़े से अन्दर प्रवेश कर गई।
लुकी छुपी नज़रों से उसने पहले ही यकीन कर लिया था कि कोई उसे देख न रहा हो। पहले की तरह बाहर का दरवाजा तालाबंद था।

अब वे दोनों कामदेव के अखाड़े में चिंतामुक्त अवस्था में प्रवेश कर चुके थे। दोनों ने एक दूसरे को देख कर एक राहत की सांस ली।
उन्हें डर था कहीं कोई मुश्किल उनके मिलन में बाधा न बन जाए। अब तक सब ठीक था और वे भगवान् का शुक्रिया अदा कर रहे थे।

दोनों ने बिना किसी वार्तालाप के एक दूसरे को आलिंगन में ले लिया और बहुत देर तक आपसी सपर्श का आनंद उठाते रहे।

मास्टरजी ने बिना ढील दिए अपने होटों को प्रगति के होटों पर रख दिया और पिछले पांच दिनों के विरह का हरजाना सा लेने लगे।
एक श्रेष्ठ शिष्या का प्रमाण देते हुए प्रगति भी उनके होटों को अपनी जीभ से खोल कर मास्टरजी के मुँह की जांच परख करने लगी।

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