मास्टरजी के घर से चोरों की तरह निकल कर घर जाते समय प्रगति का दिल जोरों से धड़क रहा था। उसके मन में ग्लानि-भाव था।
साथ ही साथ उसे ऐसा लग रहा था मानो उसने कोई चीज़ हासिल कर ली हो। मास्टरजी को वशीभूत करने का उसे गर्व सा हो रहा था।

अपने जिस्म के कई अंगों का अहसास उसे नए सिरे से होने लगा था। उसे नहीं पता था कि उसका शरीर उसे इतना सुख दे सकता है। पर मन में चोर होने के कारण वह वह भयभीत सी घर की ओर जल्दी जल्दी कदमों से जा रही थी।

जैसे किसी भूखे भेड़िये के मुँह से शिकार चुरा लिया हो, मास्टरजी गुस्से और निराशा से भरे हुए दरवाज़े की तरफ बढ़े। उन्होंने सोच लिया था जो भी होगा, उसकी ख़ैर नहीं है।

‘अरे भई, भरी दोपहरी में कौन आया है?’ मास्टरजी चिल्लाये।

जवाब का इंतज़ार किये बिना उन्होंने दरवाजा खोल दिया और अनचाहे महमान का अनादर सहित स्वागत करने को तैयार हो गए। पर दरवाज़े पर प्रगति की छोटी बहन अंजलि को देखते ही उनका गुस्सा और चिड़चिड़ापन काफूर हो गया।
अंजलि हाँफ रही थी।

‘अरे बेटा, तुम? कैसे आना हुआ?’

‘अन्दर आओ। सब ठीक तो है ना?’ मास्टरजी चिंतित हुए। उन्हें डर था कहीं उनका भांडा तो नहीं फूट गया…

अंजलि ने हाँफते हाँफते कहा- मास्टरजी, पिताजी अचानक घर जल्दी आ गए। दीदी को घर में ना पा कर गुस्सा हो रहे हैं।’

मास्टरजी- फिर क्या हुआ?’

अंजलि- मैंने कह दिया कि सहेली के साथ पढ़ने गई है, आती ही होगी।’

मास्टरजी- फिर?’

अंजलि- पिताजी ने पूछा कौन सहेली? तो मैंने कहा मास्टरजी ने कमज़ोर बच्चों के लिए ट्यूशन लगाई है वहीं गई है अपनी सहेलियों के साथ।’

अंजलि- मैंने सोचा आपको बता दूं, हो सकता है पिताजी यहाँ पता करने आ जाएँ।’

मास्टरजी- शाबाश बेटा, बहुत अच्छा किया!! तुम तो बहुत समझदार निकलीं। आओ तुम्हें मिठाई खिलाते हैं।’ यह कहते हुए मास्टरजी अंजलि का हाथ खींच कर अन्दर ले जाने लगे।

अंजलि- नहीं मास्टरजी, मिठाई अभी नहीं। मैं जल्दी में हूँ। दीदी कहाँ है?’ अंजलि की नज़रें प्रगति को घर में ढूंढ रही थीं।

मास्टरजी- वह तो अभी अभी घर गई है।’

अंजलि- कब? मैंने तो रास्ते में नहीं देखा…’

मास्टरजी- हो सकता है उसने कोई और रास्ता लिया हो। जाने दो। तुम जल्दी से एक लड्डू खा लो।

मास्टरजी ने अंजलि से पूछा- तुम चाहती हो ना कि दीदी के अच्छे नंबर आयें? हैं ना?

अंजलि- हाँ मास्टरजी। क्यों?

मास्टरजी- मैं तुम्हारी दीदी के लिए अलग से क्लास ले रहा हूँ। वह बहुत होनहार है। क्लास में फर्स्ट आएगी।

अंजलि- अच्छा?

मास्टरजी- हाँ। पर बाकी लोगों को पता चलेगा तो मुश्किल होगी, है ना?

अंजलि ने सिर हिला कर हामी भरी।

मास्टरजी- तुम तो बहुत समझदार और प्यारी लड़की हो। घर में किसी को नहीं बताना कि दीदी यहाँ पर पढ़ने आती है। माँ और पिताजी को भी नहीं… ठीक है?

अंजलि ने फिर सिर हिला दिया…

मास्टरजी- और हाँ, प्रगति को बोलना कल 11 बजे ज़रूर आ जाये। ठीक है? भूलोगी तो नहीं, ना?

अंजलि- ठीक है। बता दूँगी…

मास्टरजी- मेरी अच्छी बच्ची!! बाद में मैं तुम्हें भी अलग से पढ़ाया करूंगा।’ यह कहते कहते मास्टरजी अपनी किस्मत पर रश्क कर रहे थे। प्रगति के बाद उन्हें अंजलि के साथ खिलवाड़ का मौक़ा मिलेगा, यह सोच कर उनका मन प्रफुल्लित हो रहा था।

मास्टरजी- तुम जल्दी से एक लड्डू खा लो!

‘बाद में खाऊँगी’ बोलते हुए वह दौड़ गई।

अगले दिन मास्टरजी 11 बजे का बेचैनी से इंतज़ार रहे थे। सुबह से ही उनका धैर्य कम हो रहा था। रह रह कर वे घड़ी की सूइयाँ देख रहे थे और उनकी धीमी चाल मास्टरजी को विचलित कर रही थी।

स्कूल की छुट्टी थी इसीलिये उन्होंने अंजलि को ख़ास तौर से बोला था कि प्रगति को आने के लिए बता दे। कहीं वह छुट्टी समझ कर छुट्टी न कर दे।

वे जानते थे 10 से 4 बजे के बीच उसके माँ बाप दोनों ही काम पर होते हैं। और वे इस समय का पूरा पूरा लाभ उठाना चाहते थे।
उन्होंने हल्का नाश्ता किया और पेट को हल्का ही रखा। इस बार उन्होंने तेल मालिश करने की और बाद में रति-क्रिया करने की ठीक से तैयारी कर ली।
कमरे को साफ़ करके खूब सारी अगरबत्तियाँ जला दीं, ज़मीन पर गद्दा लगा कर एक साफ़ चादर उस पर बिछा दी।
तेल को हल्का सा गर्म कर के दो कटोरियों में रख लिया। एक कटोरी सिरहाने की तरफ और एक पायदान की तरफ रख ली जिससे उसे सरकाना ना पड़े।

साढ़े 10 बजे वह नहा धो कर ताज़ा हो गए और साफ़ कुर्ता और लुंगी पहन ली। उन्होंने जान बूझ कर चड्डी नहीं पहनी।

उधर प्रगति को जब अंजलि ने मास्टरजी का संदेशा दिया तो वह खुश भी हुई और उसके हृदय में एक अजीब सी कूक भी उठी।
उसे यह तो पता चल गया था कि मास्टरजी उसे क्या ‘पढ़ाने’ वाले हैं।
उसके गुप्तांगों में कल के अहसासों के स्मरण से एक बिजली सी लहर गई।

उसने अपने हाव भाव पर काबू रखते हुए अंजलि को ऐसे दर्शाया मानो कोई ख़ास बात नहीं है। बोली- ठीक है… देखती हूँ… अगर घर का काम पूरा हो गया तो चली जाऊँगी।

अंजलि- दीदी तुम काम की चिंता मत करो। छुटकी और मैं हैं ना… हम सब संभाल लेंगे। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।

उस बेचारी को क्या पता था कि प्रगति को ‘काम’ की ही चिंता तो सता रही थी। छुटकी, जिसका नाम दीप्ति था, अंजलि से डेढ़ साल छोटी थी।
तीनों बहनें मिल कर घर का काम संभालती थीं और माँ बाप रोज़गार जुटाने में रहते थे।

प्रगति- तुम बाद में माँ बापू से शिकायत तो नहीं करोगे?

अंजलि- हम उन्हें बताएँगे भी नहीं कि तुम मास्टरजी के पास पढ़ने गई हो। हमें मालूम है बापू नाराज़ होंगे… यह हमारा राज़ रहेगा, ठीक है!!

प्रगति को अपना मार्ग साफ़ होता दिखा। बोली- ठीक है, अगर तुम कहती हो तो चली जाती हूँ।
‘पर तुम्हें भी हमारा एक काम करना होगा…’ अंजलि ने पासा फेंका।
‘क्या?’

‘मास्टरजी मुझे मिठाई देने वाले थे पर पिताजी के डर से मैंने नहीं ली। वापस आते वक़्त उन से मिठाई लेती आना।’
‘ओह, बस इतनी सी बात… ठीक है, ले आऊँगी।’ तुम ज़रा घर को और माँ बापू को संभाल लेना।’

दोनों बहनों ने साज़िश सी रच ली। छुटकी को कुछ नहीं मालूम था। दोनों ने उसे अँधेरे में रखना ही उचित समझा। बहुत बातूनी थी और उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता था।

प्रगति अब तैयारी में लग गई, घर का ज़रूरी काम जल्दी से निपटाने के बाद नहाने गई।

उसके मन में संगीत फूट रहा था। वह नहाते वक़्त गाने गुनगुना रही थी। अपने जिस्म और गुप्तांगों को अच्छे से रगड़ कर साफ़ किया, बाल धोये और फिर साफ़ कपड़े पहने।

उसे मालूम था मालिश होने वाली है सो चोली और चड्डी के ऊपर एक ढीला ब्लाऊज और स्कर्ट पहन ली। अहतियात के तौर पर स्कूल का बस्ता भी साथ ले लिया जब कि वह जानती थी इसकी कोई आवश्यकता नहीं होगी।

ठीक पौने ग्यारह बजे वह मास्टरजी के घर के लिए चल दी।

प्रगति सुनिश्चित समय पर मास्टरजी के घर पहुँच गई।

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