प्रेषक : बिग डिक

‘ लकी प्रोजेक्ट गाइड ‘ मेरी ज़िन्दगी का वो रूहानी अनुभव है जिसे मैं ताज़िन्दगी नहीं भूल पाऊंगा… उसे शब्दों में बयाँ कर पाना बहुत मुश्किल है। मैंने सोचा नहीं था कि कहानी इतनी लंबी हो जायेगी कि उसे दो-तीन किश्तों में लिखना पड़ेगा… इसीलिये मैंने उसे सिर्फ़ “लकी प्रोजेक्ट गाइड” नाम दिया था.. पर अब तो उसे “लकी प्रोजेक्ट गाइड-१” ही कहना पड़ेगा…

खैर.. “लकी प्रोजेक्ट गाइड” में आपने पढ़ा कि हम दोनों ऑर्गाज़्म पर पहुँच चुके थे… पसीने से तर-बतर हो चुके थे.. मेरा लंड शशि की चूत द्वारा निचोड़ा जा चुका था…. मैंने उसकी कमर के खम को पकड़ा और एक झटके से पूरे लंड को बाहर निकाल दिया…शशि के योनिपटों पे घिसटता हुआ लंड जैसे ही बाहर निकाला.. उसके नितंब थरथराये और उसके मुंह से एक संतुष्ट और मादक आवाज़ निकली…”आऽऽऽऽऽऽह…..”

हम दोनों फ़र्श पर ही लेट गये…निर्वस्त्र…उनींदी आँखों से छत को ताकते हुये…

जाने कब मेरी आँख लग गई थी पता ही नहीं चला….

अचानक खुली तो देखा कि शशि मेरे सुकड़े हुये लंड का फ़ोरस्किन खिसका रही थी…और सुपाड़े के सुराख को (जहाँ से वीर्य निकलता है) बड़े प्यार से निहार रही थी….

और धीरे-धीरे अपने जीभ के अग्रभाग को नुकीला सा करके उसमें मानो घुसेड़ने की कोशिश कर रही थी…

नसों में फ़िर से संचार शुरू हो गया…. और इतनी तेज़ हुआ कि कुछ ही पलों में मेरा लंड अपनी पूरी लम्बाई में आ गया…

उसने फ़ोरस्किन को पूरा नीचे खींच दिया…. सुपाड़ा बड़ा ही भयावह लग रहा था… लाल… खूब फ़ूला हुआ…

उसने अपना थ्री-मेगापिक्सेल कैमरे वाला मोबाइल उठाया… क्लिक… क्लिक… क्लिक… अलग-अलग कोणों से तकरीबन दस फ़ोटो लिये…. कैमरा एक तरफ़ रखा…. अपनी दोनों टाँगों को मेरे पूरी अदा से इठलाते हुये मेरे कमर के आजू-बाजू रखा….. अपना मुँह मेरी तरफ़ झुकाया… अपने सुडौल स्तन मेरी छाती पे दबाए…. चुम्बन लिया… इस तरह उसके नितम्ब थोड़ा ऊपर हुये…. मेरा लंड अपने हाथ से पकड़ा…. और सुपाड़े को योनिद्वार पर रगड़ने लगी….

जितनी सिसकारियाँ उसके मुँह से निकल रही थीं उससे ज़्यादा मेरे मुँह से निकल रही थीं…. रहा नहीं जा रहा था… हाय ये भूख…. जितना खाओ उतनी ही बढ़ती है…. हाय ये प्यास… कभी ना खत्म होने वाली प्यास…

आधे घंटे पहले लग रहा था कि बस आज के लिये काफ़ी हो गया.. और अब… देर करने का मन नहीं हो रहा था…. मैं बेसाख़्ता उसके होठों को चूसने लगा… उसकी गर्दन चाटते हुये मेरी जीभ उस दरार में पेवस्त होने लगी जिसे वो ऑफ़िस में छलकाती दिखाती थी…. मेरी नाक भी दोनों स्तन के बीच आ गई थी….और मैं उस खुश्बू से मदहोश होता जा रहा था….दोनों हाथों से उसके स्तन अगल-बगल से इस तरह भींचा..कि मेरी नाक…मेरा मुँह….मेरी जीभ…और मेरा पूरा वज़ूद उसके अमृत कलशों के बीच समा गया…मुझे लगा…स्वर्ग अगर कहीं है….तो यहीं है…यहीं है…बस यहीं है….

अचानक मुझे लंड पे कुछ नमी का अहसास हुआ….

“आय एम ड्रिपिंग”…. उसने वही शोख…. वही मादक… वही सरसराती सी आवाज़ में मेरे कान में कहा…..

और आहिस्ता-आहिस्ता मेरा सुपाड़ा उसकी गहराइयाँ नापने लगा…. अंदर काफ़ी लसलसापन था.. गर्माहट थी….

उसने कुछ सेकंड के लिये अपने चूतड़ों को वैसे ही हवा में रखा…. फ़िर धीरे धीरे इस तरह ऊपर-नीचे हिलाने लगी कि लंड का सिर्फ़ तीन-चार इंच अंदर-बाहर हो रहा था…..

करीब उसके बीस बार ऐसा करने के बाद मैं इतना उत्तेजित हो गया कि अपने कूल्हे की सारी मांस्पेशियों की ताकत इकट्ठा करके एक जोरदार झटका ऊपर की ओर दिया..

कि पूरा का पूरा लंड सरसराता हुआ अंदर हो गया….

“ओ माय गॉड”…वो चीखी…

और भरभराते हुये मेरे लंड को चूत में निगलते हुये बैठ गई….

लंड को अंदर लिये-लिये ही अपने चूतड़ों को आगे-पीछे और गोल-गोल घुमाने लगी…..

उसकी झाँटें मेरी झाँटों को रगड़ते हुये अजीब उत्तेजना पैदा कर रही थी….. पन्द्रह-बीस मिनट तक यही चलता रहा। कभी मैं उसके दोनों स्तनों को पकड़ता… उन्हें चूसता… चाटता…. और कभी उसके चूतड़ों में चपत लगाता… उन्हें मसल देता फिर नीचे को ओर(अपनी ओर) धक्का देता..।

अब मैं भी अपनी गांड़ का छेद सिकोड़कर अपनी चूतड़ों को ऊपर नीचे कर रहा था… वो और जोर सी चीखने लगी… चीखते-चीखते उसका पूरा शरीर मेरे ऊपर गिर सा पड़ा…. धड़कनें और साँसें धौंकनी की मानिन्द चल रही थीं….वो अभी भी चूतड़ों को धीरे-धीरे हिला रही थी….उसकी चूत से निकला कामरस मेरी झाँटों और अंडों को भिगोता हुआ अनवरत बहता जा रहा था ….

कुछ देर में वो निश्चेष्ट सी मेरे ऊपर पड़ी थी, अचानक मैंने अपने चूतड़ उछालने की स्पीड बढ़ा दी….करीब पच्चीस धक्कों के बाद मैं इतने जोर से स्खलित हुआ कि एक तेज़ धार उसके चूत के अंदर के दीवारों पर पड़ी और वो चिहुँक उठी….मैं धीरे-धीरे हिलाता हुया शांत हो गया…..पुरसुकून शांत…संतुष्ट और तृप्त…!!

शशि….अगर तुम कहीं यह पढ़ रही हो… तो शुक्रिया… मुझे वह शाम देने के लिये… वो यादगार लम्हा देने के लिये… ( और अपनी दो और सहेलियाँ देने के लिये..)

काफ़ी देर तक वैसे ही पड़े रहने के बाद हम दोनों उठे… चाय बना के पी … और मैं उसे एक और शाम का वादा करके उसके कज़िन के घर छोड़ आया… मेरे लंड की फ़ोटो उसके पास रह गई थीं… उसके चूत की यादें मेरे साथ आ गईं थीं।

समय अपनी गति से चलता रहा… प्रोजेक्ट अपनी गति से चलता रहा….

उस दिन मैं शाम को ऑफ़िस से लेट लौट रहा था…. ट्रैफ़िक बहुत ज़्यादा थी… मेरी बाइक बस स्टॉप के ठीक सामने थी… अचानक पीछे से आवाज़ आई.. “सर”

मैंने ध्यान नहीं दिया… एक हाथ ने मेरे कंधे को छुआ… वो स्मिता थी… साँवली… बड़ी-बड़ी आँखों वाली… ढीला-ढाला सा सलवार कुर्ता पहने हुये… दुपट्टा पूरे वक्षस्थल को ऐसे ढके हुये कि जिसमें देखकर लगता था कि अंदर खाली है।…कुर्ता इतना ढीला और बड़ा था कि नितम्भ का आकार भी नहीं दिखता था। कुल मिला कर उसमें कोई सेक्स-अपील नहीं नज़र नहीं आती थी।

“स्मिता?… हियर?… व्हाट हैप्पेंड?… मिस्ड योर बस?”

“यस सर…वुड यू प्लीज़ ड्रॉप मी टू नेक्स्ट स्टॉप?”

“ओह श्योर?” ऊपर से उत्साहित और अंदर से खीझा हुआ मैं बोला।

स्मिता पीछे क्रॉस-लेग (टाँगों को दोनों तरफ़ करके) बैठी, जैसे ही ट्रैफ़िक कम हुआ, मैंने बाइक बढ़ा दी। मैं उसको जल्दी से पहुँचा देना चाहता था पर अफ़सोस कि अगले स्टॉप में भी कोई बस नहीं थी। रिमझिम बारिश शुरू हो गई थी।

“अब क्या करें?” मैंने कहा।

“सर… मैं अपना मोबाइल भूल गई… आपके मोबाइल से एक कॉल कर लूँ?”

“श्योर..”

तब तक बारिश कुछ तेज हो गई थी, हम दोनों भीगने से बचने की नाकाम कोशिश करते रहे।

बादल छाये रहने के कारण शायद मोबाइल में नेटवर्क नहीं था, आसपास कोई बूथ भी नज़र नहीं आ रहा था।

“अर्जेंट है?” मैंने पूछा।

“हाँ…” उसने कहा।

मेरा घर वहाँ से सौ कदम पे था।

मैंने बेमन से कहा,”चलो मेरे घर.. लैंडलाइन से कर लेना !”

सुनते ही उसकी आँखों में अजीब सी चमक आई…

खैर हम लोग घर पहुँचे…. काफ़ी भीग चुके थे… उसने फ़ोन लगाया और जाने क्या-क्या बातें करती रही… मैं भीतर जाकर कपड़े बदल कर आ चुका था, वो तब भी फ़ोन पे लगी हुई थी… बात करते-करते अनजाने में (यह मुझे तब लगा था… बात में पता चला कि वह हरकत जान-बूझकर की गई थी) उसने भीगा दुपट्टा निकालकर एक तरफ़ रख दिया और मेरे पूरे शरीर में एकबारगी झुरझुरी सी हो गई…. सामने का नज़ारा ही कुछ ऐसा था…

उसने लो-कट (गहरे गले वाला) कुर्ते के अन्दर एक महीन सा शमीज़ पहन रखी थी जो कि पानी में उसके बदन से चिपक गई थी और उसके ठंड से नुकीले हो चुके काले-काले निप्प्ल साफ़ नज़र आ रहे थे ! पॉपिन्स के साइज़ का ऐरोला भी दिखाई दे रहा था और झटका खाने वाली बात यह थी कि उसके स्तन एकदम तने हुये बहुत बड़े-बड़े थे, इतने बड़े जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी, जिनको वो ढीले-ढाले कुर्ते और दुपट्टे के नीचे ढकी रहती थी। स्तनों का आकार साफ़ दिखाई दे रहा था और मेरी हालत वैसी ही हो रही थी जैसे उपवास के दिन मिठाइयों को देखकर होती है…

उसने फ़ोन रखा और अचानक अपना सर ऊपर उठाया और मेरी चोरी पकड़ी गई (तब तक तो मैं उसे चोरी ही समझ रहा था…. मुझे थोड़ी पता था कि जाल बिछा हुआ था… मैं दाना चुग रहा था… और सैयाद की आँखों में चमक थी… शिकार को दाना चुगते देखने की चमक….. या खुदा…. इन लड़कियों के लिये कितना आसान होता है लड़कों को पटाना…)

कातिल मुस्कुराहट के साथ उसने पूछा,”सर आपके पास आयरन बॉक्स है?”

“य.य..यस….है !” मेरी तंद्रा भंग हुई…

“मैं ये कुर्ता आयरन कर लेती हूँ…थोड़ा सूख जायेगा… तब तक इफ़ यू डोंट माइन्ड… आपका कोई शर्ट पहन लूंगी !”

“नो प्रॉब्लम…”

मैं आगे-आगे बेडरूम की तरफ़ चला… वो पीछे-पीछे आई… मैं एक शर्ट निकालने लगा… वो मेरी तरफ़ पीठ करके कुर्ता उतारने लगी… मैंने शर्ट उसको दिया..

“प्लीज़ बाहर जाइये ना !”

तब तक भी मैं उसे शर्मीली सी लड़की समझ रहा था।

मैं हॉल में चला गया… अंदर एक तूफ़ान सा उठा हुआ था… स्मिता के निप्पल.. ऐरोला.. पुष्ट स्तन… मेरी आँखों के सामने घूम रहे थे और मन ही मन आत्मग्लानि भी हो रही थी कि मैं इतनी सीधी-साधी लड़की के बारे में इस तरह से सोच रहा था। अचानक स्मिता आ गई… मेरी शर्ट पहने हुये…. चुस्त… इतना चुस्त कि दूसरे नम्बर का बटन जैसे खुला जा रहा था… वक्ष बाहर छलक रहे थे… थोड़ी सी झिर्री से स्तन की अंदर की मादक दरार और गोलाइयाँ झाँक रहे थे… और मेरी नज़र हट नहीं रही थी…. हालांकि स्मिता साँवली सी थी पर उसके स्तनों का रंग गोरा-गोरा था…

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