प्रेषिका : माया देवी

मैं एक अच्छे खाते पीते परिवार की बहु हूँ, मेरा नाम रजनी है, मैं एक बाईस वर्षीय युवती हूँ, मेरी शादी को मात्र दो वर्ष बीते हैं।

मैं अपने घर में एकमात्र लड़की थी, मेरे दो बडे भाई थे, दोनों विदेश में रहते थे। मेरे पिता सरकारी अफसर थे, इतने बडे अफसर थे कि उन्हें बंगला मिला हुआ था। मेरी मां एक पढ़ी-लिखी स्त्री थी जो अपना अधिकतर समय तरह तरह के सामाजिक कार्यों या क्लबों में बिताती थी। मेरे बड़े भाइयों ने शादी भी विदेशी लड़कियों से की थी।

मैं स्कूल से ही आवारा हो गई थी, मैं कान्वेंट स्कूल में पढ़ती थी, जब मैं अठारहवें वर्ष मैं पहुंची, उस समय मैं ग्यारहवीं कक्षा में थी, तब से मेरी बर्बादी की कहानी आरम्भ हुई, जो इस प्रकार है :

मैं विज्ञान के विषय में जरा कमजोर थी, विज्ञान के टीचर मिस्टर डबराल मुझे तथा एक अन्य लड़की श्वेता को हमेशा डांटा करते थे। श्वेता तो मुझसे भी ज्यादा कमज़ोर थी, वह भी एक सन्पन्न परिवार से थी, अच्छी खासी सुंदर थी।

परिक्षाएँ निकट आ रही थी, मुझे डबराल सर की वार्निंग रह रह कर सता रही थी।

उन्होंने कहा था- रजनी और श्वेता तुम दोनों ने अगर विज्ञान में ध्यान नहीं दिया तो तुम दोनों का रिजल्ट बहुत खराब आएगा !

मैं चिंताग्रस्त हो उठी थी।

लेकिन एक दिन जब मैं स्कूल पहुंची, तो मैने श्वेता को बहुत ही प्रसन्न अवस्था में पाया। मैने श्वेता से पूछा,” क्या बात है श्वेता, तुम कैसे इतनी प्रसन्न हो, क्या तुम्हे डबराल सर की बात याद नहीं है?”

” अरे छोड़ो डबराल सर का खौफ और भूल जाओ विज्ञान में फेल होने का भय…. !” श्वेता ने लापरवाही से कहा।

मुझे सख्त हैरानी हुई। मैने गौर से उसके चेहरे को देखा, उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों में चंचलता विराजमान थी और गुलाबी अधरों पर मुस्कराहट !

उसके ऐसे तेवर देख कर मैने पूछा- क्या बात है, ऐसी बातें कैसे कर रही है तू… क्या अपने विज्ञान को सुधार लिया है या फिर विज्ञान में पास होने जाने की गारण्टी मिल गई है?

ऐसा ही समझ रजनी डार्लिंग ! श्वेता ने मेरी कमर में चिकोटी काटी।

मैं तो हतप्रभ रह गई,

क्या मतलब…? ..मैने स्वाभाविक ढंग से पूछा।

मतलब जानना चाहती है तो एक वादा कर कि तू किसी को यह बात बताएगी नहीं ! जो मैं तुझे बताने जा रही हूँ ! श्वेता धीमे स्वर में बोली।

ठीक है नहीं बताउंगी ! मैं बोली।

और हाँ…..अगर तुझे भी विज्ञान में अच्छे नंबर लेने है तो तू भी वो तरकीब अपना सकती है जो मैने आजमाई है ! श्वेता बोली।

अच्छा …..ऐसी क्या तरकीब है? मैने पूछा।

सुन….. ! डबराल सर ने ही मुझे बताया था और मैने उन्होंने जैसा कहा था वैसा ही किया ….बस मेरे विज्ञान में पास होने की गारण्टी हो गई…..श्वेता बोली।

अच्छा …अगर तूने वह तरकीब आसानी से अपना ली है तो फिर मैं भी आजमा सकती हूँ, ज्यादा कठिन थोड़े ही होगी…! मैं बोली।

कठिन…..? अरे कठिन तो बिलकुल भी नहीं है…. बल्कि इतनी आसान है कि पूछ मत…. लेकिन थोड़ी अजीब जरूर है….! श्वेता बोली।

अच्छा… फिर बता….मेरी जिज्ञासा बढ़ गई थी।

अपने डबराल सर हैं न ….उन्हें डांस देखने का बहुत शौक है…. अकेले रहते हैं न अपने फ्लेट में….बस उनके सामने डांस करना होता है……श्वेता बोली।

क्या…. डांस… कैसा डांस….? और फिर डांस से विज्ञान में पास होने का क्या सम्बंध ? मैने उलझते हुए कहा।

अरे…. डांस तो डांस होता है….बस ये है कि थोड़ा थोड़ा कैबरे करना होता है…. वो तो मैं तुझे करवा दूंगी, और इसका पास फेल से सीधा संम्बंध है, क्योंकि डबराल सर ने ही पिछले साल छः स्टूडेंट्स को उनके डांस से खुश होकर ही पास करवा दिया था, अब मैं भी पास हो जाउंगी क्योंकि वे मेरे डांस से भी खुश हो गए हैं… श्वेता बोली।

डांस कैसे करना होता है? मेरा मतलब है कि कपड़े पहन कर करना होता है या बिन कपड़ों के….? मैने सशंकित स्वर मैं पूछा, क्योंकि कैबरे तो लगभग नंगा ही होता है।

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