मेरे पति को अब तीस पैंतीस दिन तक किसी टूर पर नहीं जाना था, उन्होंने शिल्पा वाली कहानी कई दिनों तक मुझसे बड़ी बारीकी से सुनी थी ऑर फिर हसरत जाहिर की थी कि काश इस बार शिल्पा जब घर आये तो वो भी मौजूद हों, इस बात पर अफ़सोस भी जताया था कि जब शिल्पा वाली घटना घटी तब वह वहाँ क्यों नहीं थे.

वे इस बार टूर से सिर्फ सौन्दर्य प्रसाधन नहीं लाये थे बल्कि कई इंग्लिश मैगजीन भी लाये थे, जिनका विषय एक ही था सेक्स. उन मैगजीनों में अनेक भरी सेक्स अपील वाली मोडल्स के उत्तेजक नग्न व अर्धनग्न चित्र थे, कुछ कामोत्तेजक कहानियाँ व उदाहरण आदि थे तथा दुनिया के सेक्स से संबंधित कुछ मुख्य समाचार थे.
मैं कई दिनों तक खाली समय में उन मैगजींस को देखती व पढ़ती रही थी.

दरअसल मेरी ससुराल इस शहर से चालीस किलोमीटर दूर एक कस्बे में है, जहाँ से कभी किसी काम से मेरी ससुराल के अन्य लोग आते रहते हैं, कभी मेरे वृद्ध ससुर तो कभी ननद शिल्पा, कभी मेरा एक मात्र देवर जो शिल्पा से चार वर्ष बड़ा है, अगर शहर में उनमें से किसी को शाम हो जाती है तो वे हमारे घर में ही ठहरते हैं.

एक दिन फिर मेरी ससुराल से एक शख्स आया, वह मेरा देवर था. शाम के पांच बजे वह हमारे घर आया था, मेरे पति घर पर नहीं थे, ऑफिस से साढ़े पांच या छः बजे तक ही आते थे.

मैं सोफे पर बैठी इंग्लिश मैगजीन पढ़ रही थी, तभी कॉल-बेल बजी, मैंने मैगजीन को सेंटर टेबल पर डाला ऑर यह सोचते हुए दरवाजा खोला कि शायद मेरे पति आज ऑफिस से जल्दी आ गए हैं, लेकिन दरवाजा खोला तो पाया कि मेरा देवर जतिन सामने खड़ा है, उसने कुर्ता पायजामा पहन रखा था, वह कुर्ता पायजामा में काफी जाँच रहा था.

“भाभी जी नमस्ते!” उसने कहा और अन्दर आ गया.
“कहो जतिन! आज कैसे रास्ता भूल गये? तुम तो अपनी भाभी को पसंद ही नहीं करते शायद!” मैंने दरवाजे को लॉक करके उसकी ओर मुड़ कर कहा.
“ऐसा किसने कहा आपसे?” वह सोफे पर बैठ कर बोला. वह मेज़ से उस मैगजीन को उठा चुका था जिसे मैं देख रही थी.

मेरे दिल में धड़का हुआ, मैगजीन तो कामोत्तेजक सामग्री से भरी पड़ी थी, कहीं जतिन उसे पढ़ न ले, मैंने सोचा लेकिन फिर इस विचार ने मेरे मन को ठंडक पहुंचा दी कि अगर यह मैगजीन पढ़ ले तब हो सकता है उसकी मर्दानगी का स्वाद आज मिल जाए, इसमें भी तो जोश एकदम फ्रेश होगा! मैं निश्चिंत हो गई.

“कौन कहेगा… मैं जानती हूँ! अगर मैं तुम्हें पसंद होती तो क्या तुम यहाँ छः छः महीने में आते? आज कितने दिनों बाद शक्ल दिखा रहे हो… पूरे साढ़े पांच महीने बाद आये हो, तब भी सिर्फ एक घंटे के लिए आये थे!” मैं उसके सामने सोफे पर बैठ कर बोली.

मैंने ब्रेजियर और पेंटी पहन कर सिर्फ एक सूती मैक्सी पहन रखी थी, जिसके गहरे गले के दो बटन खुले हुए भी थे, वहाँ से मेरे गोरे गोरे सीने का रंग प्रकट हो रहा था.

मैंने देखा कि जतिन ने चोर नजरों से उस स्थान को देखा था फिर नजर झुका कर कहा- यह तो बेकार की बात है… आप जानती ही हैं कि मैं कितना व्यस्त रहता हूँ. कंप्यूटर कोर्स, पढ़ाई और फिर घर का काम… चक्की सी बनी रहती है, आज थोड़ा टाइम मिला तो इधर चला आया, वो भी शिल्पा ने भेज दिया क्योंकि भाई साहब ने फोन किया था, उन्होंने शिल्पा को बुलाया था कहा था कि उसे कुछ कपड़े दिलवाने हैं, शिल्पा को तो आज अपनी एक सहेली की शादी में जाना था सो उसने मुझे भेज दिया… जतिन बोला.

मैं समझ गई कि मेरे पति ने शिल्पा को किसलिए फोन किया होगा, कपड़े दिलवाने का तो एक बहाना है, असल बात तो वही है जिसकी उन्होंने तमन्ना जाहिर की थी.
“आज ही बुलाया था तुम्हारे भैया ने शिल्पा को?” मैंने जतिन से पूछा.
“हाँ… कहा था कि आज या कल सुबह आ जाना!” जतिन बोला.

“अच्छा तुम बैठो मैं पानी-वानी लाती हूँ!” मैंने यह कहा और सोफे से उठ कर रसोई की ओर चली गई, फ्रिज में से पानी की बोतल निकाल कर एक ग्लास में पानी डाला और ग्लास अपने देवर जतिन के सम्मुख जरा झुक कर ग्लास उसकी ओर बढ़ा कर बोली- लो पानी पीयो! मैं चाय बनाती हूँ!

जतिन ने सकपका कर मैगजीन से नजर हटाई, मैंने देख लिया था- वह एक मोडल का उत्तेजक फोटो बड़ी तल्लीनता से देख रहा था, उसके चेहरे पर ऐसे भाव आ गए जैसे चोरी पकड़ी गई हो!

उसने कांपते हाथ से ग्लास ले लिया, मेरी ओर देखने पर उसकी पैनी नजर मेरे खुले सीने पर अन्दर ब्रेजरी तक होकर वापस लौट आई, वह नजर झुका कर पानी पीने लगा तो मैं मन ही मन मुस्कुराती हुई रसोई में चली गई.

मैंने चाय पांच मिनट में ही बना ली, चाय लेकर मैं वापस ड्राइंग रूम पहुंची तो देखा कि जतिन तपते चेहरे से मैगजीन को पढ़ रहा है, मेरी आहट पाते ही उसने मैगजीन मेज़ पर उलट कर रख दी,

“लो चाय… चाय का एक कप ट्रे में से उठा कर मैंने उसकी ओर बढ़ाया, उसने कंपकंपाते हाथ से कप पकड़ लिया और नजर चुरा कर कप में फूंक मारने लगा, मैंने भी एक कप उठा लिया, मैंने महसूस कर लिया कि जतिन सेक्स के प्रति अभी संकोची भी है और अज्ञानी भी, ऐसे युवक से संबंध स्थापित करने का एक अलग ही मजा होता है, मैं सोचने लगी कि जतिन से कैसे सेक्स संबंध विकसित किया जाये ताकि मेरी यौन पिपासा में शांति पड़े.

उसके गोल चेहरे और अकसर शांत रहने वाली आँखों में मैं यह देख चकी थी कि कामोत्तेजक मैगजीन ने शांत झील में पत्थर मार दिया है और अब उसके मन में काम-भावना से संबंधित भंवर बनने लगे हैं, वह खामोशी से चाय पी रहा था, मेरी ओर यदा कदा देख लेता था.

तभी फोन की घंटी बज उठी, मैंने सोफे से उठ कर फोन का रिसीवर उठाया ओर उसे कान में लगा कर बोली- हेलो! आप कौन बोल रहे हैं?
“जानेमन हम तुम्हारे पति बोल रहे हैं.” उधर से मेरे पति का स्वर आया- हम थोड़ी देर में आयेंगे… तुम परेशान मत होना… ओ.के…
इतना कह कर उन्होंने संबंध विच्छेद भी कर दिया.

“किसका फोन था?” जतिन ने प्रश्न किया.
“तुम्हारे भाई साहब का…! मेरी कुछ सुनी भी नहीं और थोड़ी देर से आयेंगे ये कह कर रिसीवर भी रख दिया.” मैंने दोबारा उसके सामने बैठते हुए कहा.
“अब तक उनकी आदत ऐसी ही है… कमाल है!” जतिन बोला.

वह चाय ख़त्म कर चुका था, खाली कप उसने मेज़ पर रख दिया, मैं भी चाय पी चुकी थी.

“चलो टी. वी देखते हैं…” मैं सोफे से उठती हुई बोली, मैंने एक शरीर-तोड़ अंगड़ाई ली, मेरी मेक्सी में से मेरा शरीर बाहर निकलने को हुआ, जतिन के होंठों पर उसकी जीभ ने गीलापन बिखेरा और आँखें अपनी कटोरियों से बाहर आने को हुई.

मैंने टेबल से मैगजीन उठा ली और बेडरूम की ओर चल दी, जतिन मेरे पीछे पीछे था.

मैंने बेडरूम में पहुँच कर टी.वी. ऑन करके केबल पर सेट किया एक अंग्रेजी चैनल लगाया ओर बेड पर अधलेटी मुद्रा में बेड की पुश्त से पीठ लगा कर बैठ गई और मैगजीन खोल कर देखने लगी, जतिन भी बेड पर बैठ गया लेकिन मुझसे फासला बना कर.
“मुझमें कांटे लगे हैं क्या?” मैंने उससे कहा.
“जी… जी… क्या मतलब?” जतिन हड़बड़ा कर बोला.
“तुम मुझसे इतनी दूर जो बैठे हो…!” मैंने मैगजीन को बंद करके पुश्त पर रख कर कहा.
“ओह्ह… लो नजदीक बैठ जाता हूँ!” कह कर वह मेरे निकट आ गया.

उसके और मेरे शरीर में मुश्किल से चार छः अंगुल का फासला रह गया.

“तबियत ठीक नहीं है तुम्हारी…? कान कैसे लाल हो रहे हैं…! मैंने उसके चेहरे को देख कर कहा ओर उसके माथे पर हाथ लगा कर बोली- ओहो… माथा तो तप रहा है… ऐसा लगता है कि तुम्हें बुखार है… दर्द-वर्द तो नहीं हो रहा सिर में…! हो रहा हो तो सिर दबा दूँ!” मैंने कहा.
“हो तो रहा है भाभी जी… दोपहर से ही सर दर्द है…! अगर दबा दोगी तो बढ़िया ही है!” जतिन बोला.

“लाओ… गोद में रख लो सिर…” मैंने उसके सिर को अपनी ओर झुकाते हुए कहा.
उसने ऐतराज नहीं किया और मेरी जाँघों के जोड़ पर सिर रख कर लेट गया, मैं उसके माथे को हल्के हल्के दबाने लगी और मेरे मस्तिस्क में काम-विषयक अनार से छूटने शुरू हो गये थे.

“भाभी… आप बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?” जतिन बोला.
“पूछो… एक क्यों दस पूछो…” मैं टीवी से नजर हटा कर उसकी बड़ी बड़ी आँखों में झांक कर बोली.

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