प्रेषक : विक्की कुमार

अब मैं खुश था कि एक विदेशन सुन्दरी मेरी गोद में लेटी हुई है। अब उसका सिर मेरे लण्ड पर टिका हुआ था तो मुझे ऐसा लग रहा था कि उसकी हालत ठीक वैसी ही होगी जैसे की महाभारत युद्ध में बाणों की शैया पर लेटे हुए भीष्म की हुई होगी। मुझे लग रहा था कि मेरा खड़ा लण्ड उसके सिर में बिल्कुल बाण की तरह चुभ रहा होगा। एक बार देखने में तो ऐसा लग रहा थी कि वह गहरी नींद में होगी। अब लगभग पांच मिनट का इन्तजार करने के बाद मैंने अपना दायां हाथ इस प्रकार से उसके पेट की ओर रखा कि जैसे किसी छोटे बच्चे को सीट से नीचे नहीं गिर आये तो सम्भालने के लिये रखना पड़ता है।

अब थोड़ी देर तक मैंने नज़र रखी कि क्रिस्टीना ने कोई हलचल नहीं की तो मैंने अपना हाथ आहिस्ता से उसके उन्नत-शिखरों की ओर खिसका दिया। अब मेरी बाहें उसके स्तन के निचले हिस्से को छूने लगी। मेरी हालत तो बिल्कुल मेरे बस में नहीं थी, हर क्षण मैं यही कोशिश कर रहा था कि कही मैं पागल होकर उस पर टूट नहीं पडूँ। पर मैंने अपना होश नहीं खोया।

अब कुछ समय रुक कर मैंने अपना बायां हाथ उसके उन्नत स्तन पर आहिस्ता से रख दिया कि मेरी भुजाएँ उसके दोनों स्तनों को छू कर निकलें और मेरे हाथ का पंजा उसके स्तनों के पार, जैसे मैंने उसे सीट से गिरने से बचाने के लिये ऐसा किया हो, रख दिया। फिर कुछ देर इन्तजार कर अपना दायां हाथ उसकी चूत के ऊपर उसी प्रकार रख दिया। उसने कोई हलचल नहीं की।ऐसा लग रहा था कि वह गहरी नींद में है। अब बिल्कुल हौले हौले से मैंने अपने बांए हाथ का दबाव उसके स्तनों पर बढ़ाना शुरु कर दिया। अब तो मुझे मेरे हाथ व उसके स्तनों के बीच आ रही शाल बहुत खटकने लगी। अब मैंने भी अपनी शाल निकालकर अपने शरीर पर इस प्रकार डाल ली कि मेरे दोनों हाथ उसमें छुप जायें। अब मैंने अपना हाथ आहिस्ता से उसकी शाल में घुसा कर फिर से उसके स्तनों पर रख दिया। उसने सोते समय अपनी ऊनी जर्सी निकाल दी थी।

अब मेरे पंजे और उसके स्तनों के बीच मात्र एक टॉप ही था। अब मैंने उसके लो कट टाप के गले के अंदर हाथ डाला तो मेरा पहला स्पर्श उसकी सिल्की ब्रा का हुआ, पर इससे तो मुझे सन्तुष्टि नहीं हुई। फिर मैंने आहिस्ता से अपना हाथ उसकी स्तनों के बीच की घाटी में प्रविष्ट करा दिया और आहिस्ता आहिस्ता उसके दोनों स्तनों पर अपने हाथ घुमाने लगा। मैं उसकी दूध की दोनों टोंटियो से खेलने लगा। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

अब मेरे दिमाग ने काम करना बिल्कुल बंद कर दिया। मैं बिल्कुल कामातुर हो चुका था, मैं यह भूल चुका था कि यदि क्रिस्टीना ने जागकर शोर मचा दिया तो पता नहीं किस देश की जेल में सजा काटनी पड़ेगी।

इतना करने के बाद मुझे लगा कि क्रिस्टीना सोने का नाटक कर रही है क्योंकि मेरी ऐसी उत्तेजित करने वाली हरकत के बाद वह सो नहीं सकती थी, किन्तु अब मेरे पास जानने का कोई साधन नहीं था कि वह क्या सोच रही है। मैं तो उसके मौन को ही सहमति मान कर अपने हाथों को लगातार व्यस्त रखे हुए था। मुझे उसके स्तनों तक पहुँचने तक लगभग आधा घण्टा लगा होगा। हमारे इस्तन्बुल पहुँचने में करीब साढ़े चार घण्टे बाकी थे, किन्तु मेरे पास ढाई घण्टे ही बाकी थे क्योंकि गन्तव्य पर पहुँचने के पहले सभी यात्रियों को एक बार सुबह का नाश्ता दिया जाना था।

अब मैं क्रिस्टीना के स्तनों के साथ उसकी चूत को भी मसलना चाहता था। मैंने आहिस्ता से से उसकी टाइट जीन्स का बटन व चेन खोल कर उसकी मखमली पैंटी पर हाथ रख दिया और कोई प्रतिक्रिया न देखकर फिर अंदर चूत को सहलाने के लिये हाथ बढ़ाया तो मेरा हाथ एक छोटी सी कान की बाली जैसे छल्ले से टकराया।

तो क्रिस्टीना जी ने नये चल रहे फैशन के अनुसार अपनी चूत को सजाने के लिये एक बाली पहन रखी थी !

बहुत ही मादक स्पर्श था !

फिर मैंने झांटों की उम्मीद में हाथ नीचे सहलाया, तो मैं नाउम्मीद नहीं हुआ, बिल्कुल छोटी मखमली झांटों को सहलाने का लुत्फ उठाने लगा। अब लगा मेरे दोनों हाथों में जन्नत है, मेरा बायां हाथ तो उसके वक्षों से खेल रहा था और दायां हाथ उसके वस्ति-क्षेत्र का भ्रमण कर रहा था।

अब मुझे यह तो सुनिश्चित हो चुका था कि वह नींद में नहीं है तो मैं हौले से उसके भग्नासा के दाने को सहालाकर उत्तेजित करने की कोशिश करने लगा। पर पट्ठी वह भी आँखें मींचकर पड़ी हुई थी। मैंने सोचा कि अब यह गर्म है तो समय भी तो तेजी खिसका जा रहा है, इसके लिये दूसरा उपाय करना होगा। इधर उसका सिर मेरे लण्ड के ऊपर रखा था तो मेरा लण्ड भी दर्द करने लगा था। अब मैंने अपनी पैंट खोलकर उसमे से लण्ड आजाद कर उसके दायें गाल से सटा दिया, उसमें से चिपचिपाहट भी निकल रही थी जो उसके गाल को छू रही थी। अब दोबारा मैंने अपने दोनों हाथों को व्यस्त रखते हुए उसकी चूत में अपनी उंगली प्रविष्ट कराई तो देखा वहाँ गीला-गीला सा था, मतलब वह गर्म हो चुकी थी। स्तन मर्दन के साथ जैसे ही मैंने उंगली चूत में अंदर-बाहर करनी शुरु की तो क्रिस्टीना छटपटाने लगी और उसने अपनी नींद का नाटक छोड़ा और मेरी तरफ करवट बदलकर मेरे लण्ड पर हाथ फिराने के बाद उसे अपने मुँह में ले लिया। मैं तो अपने होशोहवास खो चुका था, वह भी पागलों की तरह लण्ड मुँह में अंदर-बाहर कर रही थी। उधर मैं भी उसे अपने दोनों हाथों से बराबर उसे उत्तेजित कर रहा था।

मैंने विमान में अपने चारों तरफ देखा, सभी यात्री आराम से सोए हुए थे और सम्पूर्ण अंधेरा था, तो कोई डर नहीं था कि कोई देख लेगा।

हम दोनों किसी भी किस्म की आवाज नहीं निकाल रहे थे क्योंकि कोई भी जाग सकता था।

अब क्रिस्टीना की लगातार मेहनत के कारण दस मिनट में ही मेरा लण्ड स्खलित होने की कगार पर पहुँच गया, तो मैंने उसे हाथ के इशारे से समझाने की कोशिश की पर उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। तो मैं भी क्या करता, मैंने भी वीर्य का फव्वारा उसके मुंह में छोड़ दिया। उसने भी हिम्मत दिखाते हुए पूरा का पूरा गटक लिया। अब मैं तो खाली हो गया किन्तु उसकी उत्तेजना शांत नहीं हुई थी, वह मेरे निर्जीव पड़े लण्ड को खड़ा करने की कोशिश करने लगी। मात्र पाँच मिनट में ही हम दोनों सफल हो गये। मेरा लण्ड फिर कड़क होकर फुंफकारने लगा।

अब क्रिस्टीना उठी और अपनी जींस की चेन बन्द करते हुए उसने अपने पीछे आने का इशारा किया। हम वैसे भी विमान के आखिरी हिस्से में बैठे तो, टायलेट वहाँ से नजदीक ही थे। पहले वह अंदर घुसी, फिर उसके दो मिनट बाद मैं भी अंदर पहुंच गया, अंदर जाकर दरवाजा लगा लिया। हम दोनों कामातुर होकर एक दूसरे के गले लग गये, फिर एक दूसरे के शरीर को चूमने-सहलाने लगे। विमान के टायलेट बहुत छोटे होते हैं पर उसी में काम चलाना था।

मैंने उसे पैंट और टॉप से आजाद कराया, अब वह जामुनी रंग के अन्तः वस्त्रों में मेरे सामने खडी थी और इतनी मादक लग रही थी कि उसे शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल था। उस पर उसी रंग से मिलती हुई लिपस्टिक और नेल पालिश ! ऐसा लग रहा था कि मेनका खड़ी हो जो किसी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दे।

अब उसने भी देर ना करते हुए मुझे भी नंगा कर दिया। हम दोनों पागलॉ की तरह लिपट गये और एक दूसरे के शरीर को टटोल कर आनंद लेने लग गये।

अब मैंने उसकी चोली खोल दी और पैंटी भी उतार दी, उसके तन व मेरे बीच में कोई नहीं था। मैं अब लेट्रीन सीट का ढक्कन लगा कर बैठ गया, वह मेरी गोद में दोनों टांगे बाहर की ओर निकालकर इस प्रकार बैठ गई कि उसकी चूत मेरे लण्ड को स्पर्श करने लगी।

फिर हौले-हौले शुरु हुआ दुनिया का सबसा पहला खेल, जिसे पलंग-पोलो के नाम से भी जाना जाता है। पर आज हम दोनों ने उसे टायलेट-पोलो के नाम से जमीन से लगभग 35000 फीट की ऊंचाई पर खेलना शुरु कर दिया था। वह मेरे सीने से लग कर बैठी थी, नीचे चुदाई चालू थी, वह भी हिलकर अपने शरीर को ऊपर नीचे होकर पूर्ण सहयोग कर रही थी। फिर मैं बारी बारी से उसको दोनों स्तनों पर अपनी जीभ फिराने लगा। उसके बाद मैंने उसकी गर्दन की दोनों तरफ कामुकता बढ़ाने वाली नस के साथ उसके कान की लोम व आँखों की भोहों पर भी अपनी जीभ फिराई। वह मदमस्त होकर पागल हो उठी। दोनों की सांसें एक दूसरे में विलीन हो रही थी। यदि हम किसी कमरे में होते तो पागलपन में न जाने कितनी आवाजें निकालते। पर जगह और समय का ध्यान रखते हुए बिल्कुल खामोश रहने की कोशिश करते रहे।

अब इस मदहोश करने वाली अनवरत चुदाई को लगभग आधा घण्टा हो चुका था। अब एक ही आसन में चोदते हुए थकान होने लगी थी। तभी क्रिस्टीना ने अपनी गति बढ़ा दी और कुछ ही क्षण में हांफते हुए वह चरमसीमा पर पहुँच गई। फिर वह पस्त होकर मेरी बाहों में थक कर लेट गई।

मैं तो अभी तक भरा बैठा था, मैंने कुछ समय रुककर इशारा किया कि अब मैं भी पिचकारी छोड़ना चाहता हूँ तो उसने कहा- रुको !

वह मेरी गोद में से खड़ी हुई और बेसिन पर हाथ और सिर झुकाकर खड़ी हो गई। मैंने भी पीछे से उसकी चूत में लण्ड पेल दिया और अपने दोनों हाथों से उसके उन्न्त स्तनों को मसलते हुए उसे चोदने लगा। फिर जन्नत की यात्रा शुरु हुई। फिर मदमस्त होकर वह भी आगे पीछे होकर मुझे सहयोग देने लगी। हम दोनों ने अपनी गति और बढ़ा दी और लगभग दस मिनट बाद मेरी पिचकारी छुट गई, हम दोनों पस्त हो गये।

मैंने घड़ी देखी, हमें टायलेट में घुसे अब लगभग पौन घण्टा हो चुका था, मैंने उसे इशारा किया कि अब हमें जल्दी बाहर निकलना चाहिये।

पहले मैं बाहर निकला और वह कुछ समय रुक कर सफाई कर अपनी सीट पर आ गई।

भगवान का लाख-लाख शुक्र था कि सब अभी तक सोए हुए थे और किसी को भी इस चुदाई के बारे में शक नहीं हुआ। क्रिस्टीना मुझसे चिपक कर लेट गई। पूर्ण सन्नाटा होने के कारण हम मुँह से कोई शब्द नहीं निकाल पा रहे थे किन्तु उसके होंठ मेरे होंठों से मिलकर को बहुत कुछ कह रहे थे।

मैंने अपनी जिंदगी में कई लड़कियों से सम्भोग किया लेकिन क्रिस्टीना के साथ इस अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव शब्दो में लिखना बहुत मुश्किल है।

अब हमारे गंतव्य स्थल पर पहुँचने में लगभग डेढ घण्टा बाकी था। विमान की बत्तियाँ जलना शुरु हो चुकी थी, यात्री जाग चुके थे, परिचारिकाएँ ने नाश्ता देने लगी थी। ऐसा कतई नहीं लग रहा था कि हम विगत आठ घण्टों से साथ थे, ऐसा लग रह था कि हमें मिले मात्र आठ मिनट ही हुए थे। अंततः वह निष्ठुर क्षण भी आ ही गया जब हमारा विमान इस्तन्बुल के अतातुर्क एयर पोर्ट पर उतर चुका था। मुझे तो यहाँ दो दिन रुक कर फिर बर्लिन जाना था, पर क्रिस्टिना को तो मात्र तीन घंटे बाद की उड़ान से पेरिस जाना था। हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े विमान से उतरे। हम दोनों ने निश्चय किया कि अभी मैं अपनी होटल नहीं जाकर कुछ वक्त और क्रिस्टीना के साथ एयरपोर्ट पर बिताउंगा, फिर उसकी उड़ान के समय उसे गुडबाय कह कर ही जाऊंगा। एअरपोर्ट पर ही बने एक रेस्टोरेंट में एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले निस्तेज चुपचाप बैठे रहे। हम दोनों में से कोई भी बिछुड़ने के लिये तैयार नहीं था।

इस घटना को लगभग तीन वर्ष बीत चुके हैं लेकिन यह घटना मेरे मन-मस्तिष्क पर एक चलचित्र की तरह स्पष्ट अंकित है। हालांकि क्रिस्टीना ने उस दिन अंतिम समय पर अपना निर्णय बदला और वह दो दिन मेरे साथ इस्तन्बुल में ही रुकी और फिर उसके पास मैं अगले साल पेरिस भी गया। वह आज भी मेरी बहुत अच्छी दोस्त है। क्रिस्टीना ने मुझे बॉडी-मसाज सिखलाई और बदले में मैंने उसे और उसके मित्रों को योग और सम्भोग (कामशास्त्र) की क्लास लगाकर विभिन्न आसन सिखलाये। वह भी एक अद्वितीय अनुभव था।मैं आपके पत्र का इन्तजार करुंगा, कृपया मुझे यह बतलाने का कष्ट करें कि मेरे जीवन का यह अनोखा अनुभव आपको कैसा लगा। कृपया मुझसे  पर मेल कर बतलाएँ ताकि मेरी हिम्मत अपने अगले संस्मरण लिखने की हो।

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