जैसे मैंने अन्तर्वासना पर पिछले भाग में बताया :

रात को मेरी खाट पर मेरी रजाई में मैंने किसी को पाया।
उसने दबी आवाज़ से कहा- मैं हूँ काला ! चुप रह !
यहाँ क्यूँ आये हो? मैं धीरे से बोली।
रात के दो बज रहे हैं, घोड़े बेच सो रहे हैं सभी !

उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोल घुटनों तक सरका जांघों को सहलाया। जैसे ही उसने मेरी फ़ुद्दी में हल्के से ऊँगली डाली, मैं धीरे धीरे सिसकारने लगी। कमीज़ ऊपर उठा कर वो मेरा दूध पीने लगा, मेरे मम्मे चूसने लगा, मेरे चुचूक चूसने लगा।
मैं भी बराबर उसके लौड़े को सहला रही थी। वहाँ मुँह लेना मुश्किल था।

उसने जल्दी से घोड़ी बना कर अपना लौड़ा घुसा दिया।
हाय मर गई ! काले, बहुत बढ़िया !

धीरे धीरे उसके कान के पास बोल मैं उसको उकसाने लगी- हाय रे ! तू मेरा सच्चा आशिक है ! चोद मुझे ! पटक पटक कर चोद ! हाय काले ! मेरे राजा ! क्या मस्त लौड़ा दिया भगवान् ने तुझे ! कोबरा !

साली, यहाँ कैसे जोर से करूँ?
चल निकाल ! छत पर जाती हूँ ! तू भी आ जाना !
मुझमें आग लग गई थी। अब शादी भूल सिर्फ काले का मोटा लौड़ा सामने था।

कोने में पड़ी एक तलाई को बिछाया और दीवार से लग में अपनी सलवार उतार बैठ गई और थूक लगा कर अपनी ऊँगली को अपनी फ़ुद्दी में डालने लगी।

वो ऊपर आया, आँख मार मैंने उसका स्वागत किया और उसने पास आकर अपना कोबरा मेरे मुँह में घुसा दिया- ले चूस !
कुछ देर बाद मैंने कहा- आज सिर्फ गांड दूँगी ! घोड़ी बना कर अपना मूसल लौड़ा डाल मेरी गांड में डाल !

वो जोर जोर से मारने लगा।
हाय ! यही काम नहीं हो रहा था नीचे ! हाय ! और चोद काले और !

मजे करके मैं नीचे लौट आई।
रात को लेडीज़-संगीत था, सोहन भी आ चुका था, उसकी आँखों में वासना झलक रही थी।

लेडीज़-संगीत हुआ !
करते करते रात का एक बज गया। सुबह मुझे जल्दी उठना था, पार्लर जाना था, वहां से तैयार होकर पैलेस पहुँचना था जहाँ दोपहर को मेरा लगन था।
एक मैं ही थी की ना सुधरी !

नाच-गाकर सभी थक कर सो गए क्यूंकि उठना तो सभी को जल्दी था क्यूंकि सुबह शादी थी। जैसे कि हमारे यहाँ एक रात पहले रिश्तेदार आते हैं, नाच गाने के बाद जागो निकाली जाती है, सारे गाँव में सर पर घड़ा उठा कर दिए लगा कर चक्कर निकालते हैं, लड़की घर रहती है।
मैं अपने कमरे में थी, सोहन वहाँ आ धमका।
मैंने उसे कहा- आज नहीं ! कल मेरी सुहागरात है ! क्यूँ मुझे बर्बाद करने पर तुले हो सभी !

उसने पी रखी थी, मुझे मसलने लगा।
वहाँ कोई नहीं था, बहुत मुश्किल से उसको हटाया।

रात को सोने की व्यवस्था ऐसे थी कि नीचे जमीन पर गद्दे डाले गए थे, मैंने रजाई ली और सोने लगी।
सोहन ने देखा कि मेरे साथ वाला गद्दा खाली पड़ा है तो वो वहाँ आ लेटा।

बत्ती बंद हुई तो दस मिनट बाद वो मेरे पास आ गया। नीचे धरती पर सो रहे थे तो कोई ख़ास दिक्कत नहीं थी।
थोड़ी दूर ही भाभी सो रही थी। सभी थके हुए थे।

सोहन ने मेरी सलवार खोल दी।
सोहन ! पागल हो गए हो क्या ? कल मेरा लगन है !
साली, लगन उसके साथ है ! ना कि मेरे साथ !

अगर इतनी बात थी तो पहले भाभी के ज़रिये मेरा हाथ क्यूँ नहीं माँगा था?
हाथ और तेरा? पागल हूँ क्या मैं? ना जाने कितनों से ठुकी है ! अगर तेरे से शादी हो तो शादी के बाद मुझे आने-बहाने मेरे सारे दोस्त आते जाते दिखाई देते घर में !

उसने ब्रा का हुक खोल दिया।
क्या मम्मे हैं साली तेरे ! न जाने किस-किस ने इन कबूतरों के पर कुतरे होंगे !

वो मेरी फ़ुद्दी सहलाने लगा और मेरे हाथ में अपना मोटा लंबा मूसल पकड़ा दिया।
देखो मैंने बड़ी मुश्किल से जैल की मालिश से कसाव लाई हूँ फ़ुद्दी में ! एक रात पहले दोबारा ढीली नहीं करवानी मुझे !

उसने मुझे मसलना शुरु किया।
यहाँ नहीं कुछ होगा ! बोला- मेरे साथ पीछे स्टोर में चल !
मैंने कहा- सिर्फ एक शर्त पर ! आज सिर्फ गांड दूँगी !
चल !

वहाँ जाते ही उसने मुझे दबोच लिया, मेरी सलवार उतार कर पास पड़ी पेटी पर फेंकी और गोलाइयों को सहलाने-दबाने लगा। उसने कुछ देर मेरा दूध पिया, फिर मैं खुद ही झुक गई।

उसने दोनों हाथों से चूतड़ खींच छेद पर लौड़ा रख झटका दिया।
सोहन का लौड़ा आराम से मेरी गांड में उतर गया।
सोहन ने एक घंटा मुझे ठोका, दो बार मेरी गांड में पानी छोड़ा।

उसके बाद हम दोनों वापिस जाकर सो गए।
माँ ने सुबह उठाया- जल्दी जल्दी उठ !
मुझे हल्दी लगाई।

सोहन बोला- दीदी, मैं इसको पार्लर छोड़ देता हूँ। फिर वहाँ से वापिस पैलेस ले जाऊँगा !
माँ ने मेरे साथ उसकी ड्यूटी लगा दी।

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