प्रेषिका : साहिरा
मुझे गलत मत समझना! मुझे अपने अपने बच्चों से प्यार है। पति के पास पुरखों की काफ़ी जायदाद है और हमें किस चीज़ की कोई कमी नहीं है।

मेरे पास सब है जो मैं चाहती हूँ, बस यौन सुख के अलावा!

मैं बत्तीस साल की हूँ। सात साल पहले जब मेरी शादी मनोज से हुई तो ससुराल में मेरे पति के अलावा मेरे ससुर जी कुलभूषण ही थे।

आज परिवार में मैं, मेरे पति मनोज, मेरा छोटा सा बेटा पल्ल्व और एक बेटी नताशा हैं। ससुर जी का देहाँत हो चुका है।

मेरे पिताजी का परिवार बहुत ग़रीब था। चार बहनों में से मैं सबसे बड़ी संतान थी। मेरी माँ लम्बी बीमारी के बाद मर गई।

माँ के इलाज के लिए पिताजी ने क्या कुछ नहीं किया। ढेर सारा कर्ज़ा हो गया। पिताजी रेवेन्यू ऑफिस में क्लर्क की नौकरी करते थे। इनकी आमदनी से मुश्किल से गुज़ारा होता था। मैं छोटे-मोटे काम कर लेती थी।

आमदनी का और कोई साधन नहीं था कि हम कर्ज़ा चुका सकें। लेनदार लोग तकाज़े करते रहते थे। फिक्र से पिताजी की सेहत भी बिगड़ने लगी थी।

ऐसे में मेरे सम्भावित ससुर कुलभूषण ने मदद दी। उनका इकलौता बेटा मनोज कुँवारा था। दिमाग़ से थोड़ा सा पिछड़ा होने के कारण उसे कोई कन्या नहीं देता था। कुलभूषण की पत्नी भी छः माह पहले ही मर चुकी थी। घर सँभालने वाली कोई नहीं थी।

उन्होंने जब कर्ज़ के बदले में मेरा हाथ माँगा तो पिताजी ने तुरन्त ना बोल दी। मैं हाईस्कूल तक पढ़ी हुई थी। आगे कॉलेज में पढ़ने वाली थी। मेरे जैसी लड़की कैसे मनोज जैसे लड़के के साथ ज़िन्दगी गुज़ार सकेगी?

इस पर मैंने पिताजी से कहा,’आप मेरी फिक्र मत कीजिए। मेरी तीनों बहनों की सोचिए। आप रिश्ता मंज़ूर कर लीजिए, और सिर पर से कर्ज़ का बोझ दूर कीजिए। मैं सँभाल लूँगी।’

अपने हृदय पर पत्थर रख कर पिताजी ने मुझे मनोज से ब्याह दिया। तब मैं 19 साल की थी। मैं ससुराल में आई।

पहले ही दिन ससुरजी ने मुझे पास बिठा कर कहा: ‘देख बेटी, मैं जानता हूँ कि मनोज से शादी करके तूने बड़ा बलिदान दिया है। मैंने तेरे पिताजी का कर्ज़ा पूरा करवा दिया है। लेकिन तूने जो किया है उसकी क़ीमत पैसों में नहीं गिनी जा सकती। तूने तेरे पिताजी पर और साथ ही मुझ पर भी बड़ा उपकार किया है।’

मैंने कहा,’पिताजी…’

उन्होंने मुझे बोलने नहीं दिया। कहने लगे: ‘पहले मेरी सुन ले। बाद में कहना… जो तेरा जी चाहे… ठीक है? तू मेरी बेटी बराबर है। ख़ैर, मुझे साफ़-साफ़ बताना पड़ेगा।’

उन्होंने नज़रें फिरा लीं और कहा,’मैंने मनोज का वो देखा है, मुझे विश्वास है कि वो तेरे साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकेगा और बच्चा पैदा कर सकेगा। मेरी यह विनती है कि तू ज़रा सब्र से काम लेना, जैसी ज़रूरत पड़े वैसी उसे मदद करना।’

यह सब सुनकर मुझे शरम आती थी। मेरा चेहरा लाल हो गया था और मैं उनसे नज़रें नहीं मिला पा रही थी। मैंने कुछ न कहा।

वो आगे बोले,’तुम्हारी सुहागरात परसों है, आज नहीं। मैं तुम्हें एक क़िताब देता हूँ, पढ़ लेना। सुहागरात पर काम आएगी। और मुझसे शरमाना मत, मैं तेरा पिता जैसा ही हूँ।’

मुझसे नज़रें चुराते हुए उन्होंने मुझे किताब दी और चले गए।

किताब कामशास्त्र की थी। मैंने ऐसी किताब के बारे में सुना था लेकिन कभी देखी नहीं थी। किताब में चुदाई में लगे जोड़ों के चित्र थे।

मैं ख़ूब जानती थी कि चुदाई क्या होती है, लंड क्या होता है, छुटना क्या है इत्यादि। फिर भी चित्रों को देखकर मुझे शरम आ गई।

इन में से कई तस्वीरें तो ऐसी थी जिनके बारे में मैंने तो कभी सोचा तक ना था। एक चित्र में औरत ने लंड मुँह में लिया हुआ था। छिः छिः, इतना गंदा?
दूसरे में उसी औरत की चूत आदमी चाट रहा था।
एक में आदमी का पूरा लंड औरत की गाँड में घुसा हुआ दिखाया था।

कई चित्रों में एक औरत दो-दो आदमी से चुदवाती दिखाई थी। ये देखने में मैं इतनी तल्लीन हो गई कि कब मनोज कमरे में आए, वो मुझे पता ना चला। आते ही उसने मुझे पीछे से मेरे आँखों पर हाथ रख दिया और बोले,’कौन हूँ मैं?’

मैंने उनकी कलाईयाँ पकड़ लीं और बोली,’छोड़िए, कोई देख लेगा।’

मुझे छोड़कर वह सामने आए और बोले: क्या पढ़ती हो? कहानियों की किताब है?’

अब मेरे लिए समस्या हो गई कि उन्हें वह किताब मैं कैसे दिखाऊँ। किताब छुपा कर मैंने कहा,’हाँ, कहानियों की किताब है। रात में आपको सुनाऊँगी।’

खुश होकर वो चला गया। कितना भोला था! उसकी जगह कोई दूसरा होता तो मुझे छेड़े बिना नहीं जाता। दो दिन बाद मैंने देखा कि लोग मनोज की हँसी उड़ा रहे थे। कोई-कोई भाभी कहती: देवरजी, देवरानी ले आए हो, तो उनसे क्या करोगे?

उनके दोस्त कहते थे: भाभी गरम हो जाए और तेरी समझ में न आए तो मुझे बुला लेना।

एक ने तो सीधा पूछा: मनोज, चूत कहाँ होती है, वो पता है?

मुझे उन लोगों की मज़ाक पसन्द ना आई। अब मैं ससुरजी के दिल का दर्द समझ सकी। मुझे उन दोनों पर तरस भी आया। मैंने निर्णय किया कि मैं बाज़ी अपने हाथ में लूँगी, और सबकी ज़ुबान बन्द कर दूँगी, चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।

तीसरी रात सुहागरात थी।
मेरी उम्र के दो रिश्ते की ननदों ने मुझे सजाया-सँवारा और शयनकक्ष में छोड़ दिया।
दूसरी एक चाची मनोज को ले आई और दरवाज़ा बन्द करके चली गईं।

मैं घूँघट में पलंग पर बैठी थी। घूँघट हटाने के बदले मनोज नीचे झुक कर झाँकने लगा।

वो बोला: देख लिया, मैंने देख लिया। तुमको मैंने देख लिया। चलो अब मेरी बारी, मैं छुप जाता हूँ, तुम मुझे ढूँढ़ निकालो। वह छोटे बच्चे की तरह छुपा-छुपी का खेल खेलना चाहता था। मुझे लगा कि मुझे ही शुरुआत करनी पड़ेगी।

घूँघट हटा कर मैंने पूछा: पहले ये बताओ कि मैं तुम्हें पसन्द हूँ या नहीं?

मनोज शरमा कर बोला: बहुत पसन्द हो। मुझे कहानियाँ सुनाओगी ना?

मैं: ज़रूर सुनाऊँगी। लकिन थोड़ी देर तुम मुझसे बातें करो।

मनोज: कौन सी कहानी सुनाओगी? वो किताब वाली जो तुम पढ़ रहीं थीं वो?

मैं: हाँ, अब ये बताओ कि मैं तुम्हारी कौन हूँ?

मनोज: वाह, इतना नहीं जानती हो? तुम मेरी पत्नी हो, और मैं तेरा पति।

मैं: पति-पत्नी आपस में मिलकर क्या करते हैं?
मनोज: मैं जानता हूँ, लेकिन बताऊँगा नहीं।

मैं: क्यों?
मनोज: वो जो सुरेन्द्र है ना! कहता है कि पति-पत्नी गंदा करते हैं!

मैंने यह नहीं पूछा कि सुरेन्द्र कौन है, मैंने सीधा पूछा: गंदा मायने क्या? नाम तो कहो, मैं भी जानूँ तो।

मनोज: चोदते हैं।
लम्बा मुँह करके मैं बोली: अच्छा?

बिन बोले उसने सिर हिला कर हाँ कही।
गम्भीर मुँह से मैंने फिर पूछा: लेकिन यह चोदना क्या होता है?
मनोज: सुरेन्द्र ने कभी मुझे यह नहीं बताया।

शरमाने का दिखावा करके मैंने कहा: मैं जानती हूँ, कहूँ?

मनोज: हाँ, हाँ, कहो तो।

उस रात मनोज ने बताया कि कभी-कभी उसका लंड खड़ा होता था। कभी-कभी स्वप्न-दोष भी होता था। कुलभूषण सच कहते थे। उन्होंने मनोज का खड़ा लंड देखा होगा।

मैंने बात आगे बढ़ाई: ये कहो, मुझमें सबसे अच्छा क्या लगता है तुम्हें? मेरा चेहरा? मेरे हाथ? मेरे पाँव? मेरे ये…? मैंने उसका हाथ पकड़ कर स्तन पर रख दिया।
मनोज: कहूँ? तेरे गाल।

मैं: मुझे पप्पी दोगे?
मनोज: क्यों नहीं?

उसने गाल पर चूमा, और मैंने फिर उसके गाल पर। उसके लिए यह खेल था। जैसे ही मैंने अपने होंठ उसके होंठो से लगाया, तो उसने झटके से छुड़ा लिया और बोला: छिः छिः ऐसा गन्दा क्यूँ करती हो?

मैं: गंदा सही? तुम्हें मीठा नहीं लगता?
मनोज: फिर से करो तो।

मैंने मुँह से मुँह लगा कर चूमना शुरु कर दिया।
मनोज: अच्छा लगता है, करो ना ऐसी पप्पी।

मैंने चूमने दिया। मैंने मुँह खोल कर उसके होंठ चाटे, और वही सिलसिला दोहराया।

मैंने पूछा: प्यारे, पप्पी करते-करते तुमको कुछ होता है?

मनोज शरमा कर कुछ बोला नहीं।

मैंने कहा: नीचे पेशाब की जगह में कुछ होता है ना?
मनोज: तुमको कैसे मालूम?

मैं: मैं स्कूल में पढ़ी हूँ, इसलिए। कहो, उधर गुदगुदी होती है ना?

मनोज: किसी से कहना मत।

मैं: नहीं कहूँगी। मैं तुम्हारी पत्नी जो हूँ।

मनोज: मेरी नुन्नी में गुदगुदी होती है और कड़ा हो जाता है।

मैं: मैं देख सकती हूँ?
मनोज: नहीं। अच्छे घर की लड़कियाँ लड़कों की नुन्नी नहीं देखा करतीं।
मैं: मैंने तो स्कूल में ऐसा पढ़ा है कि पति-पत्नी के बीच कोई भी राज़ नहीं रहता है। पत्नी पति की नुन्नी देख सकती है और उनसे खेल भी सकती है। पति भी पत्नी की वो… वो… भोस देख सकता है, तुमने मेरी देखनी है?

मनोज: पिताजी जानेंगे तो बड़ी पिटाई होगी।

मैं: शह्ह्हह… कौन कहेगा उनसे? हमारी ये बात गुप्त रहेगी, कोई नहीं जान पाएगा।

मनोज: हाँ, हाँ कोई नहीं जान पाएगा।
मैं: खोलो तो तुम्हारा पाजामा।

पाजामा खोलने में मुझे मदद करनी पड़ी। निकर उतारी।
तब फनफनाता हुआ उसका सात इंच का लम्बा लंड निकल पड़ा।
मैं खुश हो गई, मैंने मुट्ठी में पकड़ लिया और कहा: जानते हो? ये तुम्हारी नुन्नी नहीं है। यह तो लंड है।

मनोज: तुम बहुत गन्दा बोलती हो।
मैंने लण्ड पर मुठ मारी और पूछा: कैसा लगता है?

लंड ने एक-दो ठुमके लगाए।

वो बोला: बहुत गुदगुदी होती है।
मैं: मेरी भोस देखनी नहीं है?

मनोज: हाँ, हाँ।

यह वक्त मेरे शरमाने का नहीं था। मैं पलंग पर चित्त लेट गई, घाघरी उठाई और पैन्टी उतार दी।
वह मेरी नंगी भोस देखता ही रह गया, बोला: मैं इसे छू सकता हूँ?

मैं: क्यों नहीं? मैंने जो तुम्हारा लंड पकड़ रक्खा है।

डरते-डरते उसने भोस के बड़े होंठ छुए। मेरे कहने पर चौड़े किए। भीतरी हिस्सा काम-रस से गीला था। आश्चर्य से वो देखता ही रहा।

मैं: देखा? वो जो चूत है ना, वो इतनी गहरी होती है कि सारा लंड अन्दर समा जाए।

मनोज: हो सकता है, लेकिन चूत में लंड डालने की क्या ज़रूरत?

मैं: प्यारे, इसे ही चुदाई कहते हैं।
मनोज: ना, ना, तुम झूठ बोलती हो।

मैं: मैं क्यूँ झूठ बोलूँ? तुम तो मेरे प्यारे पति हो। मैंने अभी अपनी भोस दिखाई कि नहीं?

मनोज: मैं नहीं मानता।

मैं: क्या नहीं मानते?

मनोज: वो जो तुम कहती हो ना कि लंड चूत में डाला जाता है।

मुझे वो किताब याद आ गई। मैंने कहा: ठहरो, मैं दिखाती हूँ। किताब के पहले पन्ने पर कुलभूषण लिखा हुआ था. वो दिखा कर मैंने कहा: ये किताब पिताजी की है। तस्वीरें देख वह हैरान रह गया। मैंने कहा: देख लिया ना? अब तसल्ली हुई कि चुदाई में क्या होता है?

उस पर कोई असर न पड़ा। वो बोला: मुझे पेशाब लगी है।
मैं: जाईए पेशाब करने के बाद लंड पानी से धो लीजिए।

वह पेशाब कर आया। उसका लंड नर्म हो गया था। मैंने लाख सहलाया, फिर से हिला नहीं। मुँह में लेकर चूसना चाहा, पर मनोज ने ऐसा करने ना दिया। रात काफ़ी बीत चुकी थी। मैं उत्तेजित भी हो गई थी, लेकिन मनोज अनाड़ी था।

लंड खड़ा होने के बावज़ूद उसके दिमाग़ में चोदने की इच्छा पैदा नहीं हुई थी। वो बोला: मुझे नींद आ रही है।

मैंने उसे गोद में लेकर सुलाया, तो तुरन्त नींद में खो गया। मैंने सोचा आगे-आगे चुदाई के पाठ पढ़ाऊँगी और एक दिन उसका लंड मेरी चूत में लेकर चुदवाऊँगी ज़रूर। लेकिन मेरे नसीब़ में कुछ और लिखा था।

उनके कुछ शरारती दोस्तों ने उनके दिल में ठसा दिया कि चूत में दाँत होते हैं, नूनी जो चूत में डाली तो चूत उसे काट लेगी। फिर पेशाब कहाँ से करेगा। मैंने लाख समझाया, लेकिन वो नहीं माना। मैंने कहा कि ऊँगलियाँ डाल कर देख लो कि अन्दर दाँत हैं या नहीं। उसने वह भी नहीं किया। बिन चुदवाए मैं कँवारी ही रही।

कुलभूषण की पहचान वाले और मनोज के कई मुँह-बोले दोस्तों में से कितनी ही ऐसे थे जिन्होंने मुझ पर बुरी नज़र डाली।

दूर के एक देवर ने खुला पूछ लिया: भाभी, मनोज चोद ना सके, तो घबराना नहीं, मैं जो हूँ। चाहे तब बुला लेना। उन सबको मैंने कह दिया कि मनोज मेरे पति हैं और मुझे अच्छी तरह चोदते हैं। दिनभर मैं उन सब का हिम्मत से सामना करती थी। रात अनाड़ी बलम से बिन चुदवाए फूट-फूट कर रो लेती थी।

कुलभूषण लेकिन होशियार थे, उन्हें यकीन हो गया था कि मनोज ने मुझे चोदा नहीं था। मुझे शक है कि चुपके से वो हमारे बेडरूम में देखा करते थे। जो कुछ भी हो, उन्हें पितामह बनने का उतावलापन था।

एक दिन एकांत पाकर मुझसे पूछा: क्यूँ बेटी? सब ठीक हैना?

उनका इशारा चुदाई की ओर था जानकर मुझे शर्म आ गई। मैंने सिर झुका लिया और कुछ ना कह सकी… मैं रो पड़ी।

मेरे कंधों पर हाथ रखकर वो बोले: मैं सब जानता हूँ, तू अभी भी कँवारी है। मनोज ने तुझे चोदा नहीं है सच है ना?

ससुरजी के मुँह से चोदा शब्द सुनकर मैं चौंक गई, उनकी बाँहों से निकल गई, कुछ बोली नहीं। आँसू पोंछ कर सिर हिला कर हाँ कहा।

वो फिर मेरे नज़दीक आए, मेरे कंधों पर अपनी बाँह रख दी और बोले: बेटी, ये राज़ हम हमारे बीच रखेंगे कि मनोज चोदने के क़ाबिल नहीं है। लेकिन मुझे पोता चाहिए, इसका क्या? मेरी इतनी बड़ी जायदाद, इतना बड़ा कारोबार सब सफ़ा हो जाएँगे, मेरे मरने के बाद। वो तो वो लेकिन जब मैं इस दुनिया में ना रहूँ तब तेरी और मनोज की देख-भाल कौन करेगा जब तुम दोनों बुड्ढे हो जाओगे? मुझे लड़का चाहिए। है कोई इलाज तेरे पास?

मैंने कहा: मैं क्या कर सकती हूँ पिताजी?
कुलभूषण: तुझे करना कहाँ है? करवाना है समझीं?

मैं: हाँ, लेकिन किस के पास जाऊँ? आप की इच्छा है कि मैं कोई और मर्द छीः छी:। मुझसे यह नहीं हो सकेगा।

कुलभूषण: मैं कहाँ कहता हूँ कि तू ग़ैर मर्द से चुदवा।

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