लेखक : जय कुमार

हम लोग पौने चार बजे हरिद्वार पहुँच गये।

कमल के पापा ने मुझे अवाज़ लगाई- जय बेटे, अब बताओ कि पहले किस जगह पर चलें?

मैंने कहा- अंकल जी, पहले हर की पैड़ी पर चलते हैं। पहले नहाते हैं, फिर मनसा देवी पर चढ़ाई करेंगें।

उन्होंने कहा- ठीक है।

और हम लोग पर्किग की तरफ जैसे ही चले, तभी मैंने देखा कि सुनील सामने बाईक लेकर के खड़ा हुआ है। मैंने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा, मैं सुनील से मिलने के लिये गाड़ी से बाहर आया, सुनील ने मुझे देखते ही मुझे बाँहो में भर लिया और हम दोनों आपस में बात करने लगे। कमल मेरे पास आया और मैंने उसका सुनील से परिचय कराया।

सुनील ने कहा- अगर आपको कोई भी परेशानी हो तो मुझे फोन कर देना बस ! अब मैं निकलता हूँ।

और यह कहकर सुनील अपने किसी दोस्त की बाईक पर बैठा और चल दिया।

मैंने कमल से कहा- गाड़ी को पार्किंग में लगाओ, मैं आ रहा हूँ !

मैंने बाईक उठाई और उनसे पहले ही हर की पैड़ी पर पहुँच गया। मैंने देखा कि मोनी मेरा बैग अपने साथ लेकर आ रही है, मैं तो अपना बैग भूल ही गया था।

जब सब लोग हर की पैड़ी पर पहुँच गये तो मैंने कहा- अंकल जी, इस समय कम भीड़ है, हम लोग यहाँ पर नहा लेते हैं, ये नारी स्नान-गृह में नहा लेगीं।

तभी मोनी ने कहा- पापा, हम लोग वहाँ पर नहीं जाएँगे, वहाँ पर तो बहुत ही ज्यादा गन्दगी होती है। हम सभी आप लोगों के ही साथ ही नहाएँगे।

अंकल ने कहा- हाँ बेटी मोनी, तुम ठीक कह रही हो, यही ठीक है।

हम सब लोग नहाने लगे तो मैंने मोनी को अवाज दी तो मोनी गीले ही कपडों में ही मेरे पास आई और कहने लगी- जय नहाने भी नहीं दोगे क्या?

मैंने कहा- मोनी, मेरा बैग दो !

मोनी बोली- आप अपना समान भी नहीं उठा सकते? मेरे पास नहीं है !

और कहने लगी- अब मैं आपको कैसी लग रही हूँ?

मैंने कहा- मोनी, तुम ये फालतू की बात मत करो ! मैंने कुछ पूछा है?

तो कहने लगी- सामने बैग रखा है ना।

मैंने देखा कि मोनी सही कह रही है, मैंने कहा- मोनी अब जा कर नहा लो !

मैंने अपना बैग उठाया और तौलिया, निकर लेकर अपने कपड़े उतार कर बैग में रखे और जैसे ही नहाने के लिये छलांग लगाने वाला था कि मैंने देखा कि सब लोगे मुझे ही घूर रहे हैं।

तो मैंने कहा- अंकल जी, मेरे बारे में फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं, मुझे तैरना आता है।

यह कहकर मैंने छलांग लगा दी। मैं जैसे ही पानी से बाहर आया तो देखा कि सारे लोग मुझे ही देख रहे हैं। मैं दूसरी तरफ निकल गया और उधर से छलांग लगाई और उन लोगों के पास पहुँच गया।

मैंने कमल से कहा- यार, यह जंजीर पकड़ कर क्या नहाते हो? आओ मेरे साथ नहाओ ना !

कमल कहने लगा- नहीं पानी बहुत ही तेज हैं और मुझे डर लगता है।

और हम सब लोग हँसने लगे। मोनी कहने लगी- जय, मुझे एक बार अपने साथ उस तरफ ले जा सकते हो?

मैंने कहा- नहीं, मैं नहीं ले जाऊँगा।

मोनी ने कहा- क्यों डर गये क्या?

मैंने कहा- नहीं ऐसी बात नहीं !

तो कहने लगी- एक बार मुझे पार कराओ ! और अपने पापा से बोली- पापा, जय से कहो ना !

तो कमल के पापा कहने लगे- जय, एक बार इनको पार करा दो ना ! ये बहुत ही जिद्दी हैं !

फिर मैंने कहा- जैसे ही पानी के अन्दर जाये तो अपने हाथ और पैर पानी के हिसाब से बैलेंस के साथ चलाये, पानी बहुत ही तेज है।

तो मोनी कहने लगी- मैं कमल भईया की तरह से डरपोक नहीं हूँ !

हम सब लोग हँसने लगे और मोनी पानी में कूद गई और मैं भी मोनी के पीछे पानी में कूद गया और मैंने देखा कि मोनी तो तैरना जानती है पर कुछ डूबने का नाटक करने लगी।

मैं भी अब कम रहने वाला नहीं था, मैंने पानी के अन्दर जाकर मोनी को अपने ऊपर लिया और धीरे धीरे किनारे की तरफ बढ़ने लगा। मोनी ने मुझे कस कर पकड़ लिया और हम दोनों किनारे पर पहुँच गये।

मोनी कहने लगी- जय, मजा आ गया ! एक बार और हो जाये?

मैंने मोनी को देखकर कहा- लगता है तुम सभी घर वाले ज्यादा ही रोमांटिक हो !

मोनी कहने लगी- अभी आपने देखा ही क्या है? आप धीरे-धीरे सब कुछ समझ जाओगे।

मोनी के कपड़े शरीर से चिपके हुऐ थे और बहुत ही सुन्दर लग रही थी।

मैंने कहा- चलो बातें छोड़ो और सभी लोगों के पास चलते हैं !

और फिर से हम लोग पानी के अन्दर गये और पार करके बाहर आ गए।

नीता ने कहा- एक बार मुझे भी पार कराओ ना?

मैंने मोनी से कहा- मोनी, अपनी भाभी को तैरना सिखा दो !

तो मोनी कहने लगी- ये पेटिकोट मैं तैरेंगी?

और कहकर हँसने लगी तो नीता बोली- मोनी तुझे मैं छोड़ूँगी नहीं ! देख लेना !

और वो सभी लोग नहाने लगे।

मैंने अपने कपड़े बदल लिये और अपने बैग को लेकर एक तरफ जाने लगा। तभी अंकल ने आवाज लगाई- जय, बच्चों ने भी तो कपड़े बदलने हैं, यहीं पर रुको।

और मुझे मन मार कर वहीं पर रुकना पड़ा। जब सभी लोग नहा कर बाहर आये तो मैंने कहा- अंकल आप अपने कपड़े यहीं पर बदल लो और बाकी को उधर लेडीज वाले हॉल में भेज दो !

तो आन्टी कहने लगी- बेटा, वहाँ पर तो बहुत गन्दा होता है, मैं नहीं जाऊँगी। हम यहीं पर कपड़े बदल लेंगे। जय तुम कमल के साथ यह चादर पकड़ लेना !

और हम दोनों ने एक घेरा बना कर चादर पकड़ ली। आन्टी, नीता और मोनी ने एक एक करके अपने कपड़े बदल लिये और गीले कपड़े एक पोलिथिन में डाल लिये।

मैंने कहा- अंकल, अब किस जगह पर चलोगे?

तो अंकल ने कहा- जय, तुम ही बताओ कि पहले कहाँ चलें !

मैंने कहा- मनसा देवी चलते हैं !

तो सब लोग कहने लगे- ठीक है। मनसा देवी ही चलते हैं !

सब गाड़ी में बैठ गये, मैंने कहा- कमल, आप लोग चलो, मैं आपको वहीं पर मिलता हूँ।

तो कमल कहने लगा- तुम कैसे आओगे?

तो मैं कहने लगा- मेरे पास बाईक है, चलो, मैं आपको रास्ते में मिलता हूँ !

तो कमल कहने लगा- यह बाईक कहाँ से आ गई?

मैंने कहा- दोस्त की है ! चलो, मैं वहीं पर मिलता हूँ।

वो सभी लोग अप्पर रोड पर मनसा देवी की तरफ चल दिये। मैंने भी अपना बैग कन्धे पर रखा और उन लोगों से पहले ही मनसा देवी वाले रास्ते पर पहुँच गया। थोड़ी देर में ही सब लोग पहुँच गये तो मैंने कहा- अंकल, किस रास्ते से चलना है?

अंकल ने कहा- सीढ़ियों वाले रास्ते से चलते हैं !

मैंने कहा- ठीक है अंकल, मैं आप लोगों को ऊपर ही मिलता हूँ !

तो अंकल ने कहा- तुम हमारे साथ नहीं चलोगे क्या ?

मैंने कहा- नहीं, मैं तो बाईक से जाता हूँ ! आप मेरे साथ चलो !

अंकल ने कहा- नहीं जय, मुझे तो डर लगता है।

तभी मोनी कहने लगी- जय, मैं चलती हूँ !

मैंने कहा- नहीं, मैं अकेले ही ठीक हूँ !

तो नीता ने कहा- पापा मुझे कुछ थकावट हो रही है, क्या मैं जय के साथ चली जाऊँ?

अंकल ने कहा- आप लोगों की जैसे मर्जी।

मैंने कहा- अंकल ये साड़ी पहने हुए हैं और चढ़ाई बहुत ज्यादा है।

तो नीता ने कहा- मैं अपने कपड़े बदल लेती हूँ।

मैंने कहा- नीता जी, आप रहने दो, मैं मोनी को ले जाता हूँ, मोनी ने जीन्स पहनी हुई है।

तो नीता नराज होने लगी- आप मुझे क्यों नहीं ले जाना चाहते?

मैंने कहा- कोई बात नहीं ! मोनी, तुम चलो मेरे साथ !

तो मोनी कहने लगी- नहीं जय, भाभी दो मिनट में कपड़े बदल कर आ जाएँगी। हम अपनी भाभी की किसी भी बात को मना नहीं करते।

तो कमल कहने लगा- जय, मोनी ठीक कह रही है, नीता आपके साथ चली जायेगी।

नीता ने गाड़ी से बैग निकाला और पास के लॉज़ में चली गई और पाँच मिनट में कपड़े बदल कर आ गई और कहने लगी- जय, अपना बैग मुझे दो !

तो मैंने अपना बैग नीता को दिया। नीता ने बैग अपनी कमर पर लटका लिया और सब को बाय किया। हम लोग बाईक पर बैठ कर चल दिये। नीता मुझसे चिपक कर बैठ गई।

तभी अंकल ने कहा- जय बेटे, जरा सँभल कर जाना !

मैंने कहा- ठीक है !

और हम लोग चल दिये। थोड़ी दूर जाने के बाद मैंने नीता से कहा- नीता जी, मुझे भूख लगी है ! कुछ खा लिया जाये?

तो नीता ने कहा- हाँ जय, भूख तो मुझे भी लगी है, बताओ क्या खाओगे?

मैंने कहा- देखते हैं क्या मिलता है?

और मैंने एक होटल के पास बाईक खड़ी की, अन्दर गये, होटल वाले से पूछा- क्या-क्या है खाने के लिये?

तो उसने कहा- हमारे यहाँ सवेरे-सवेरे छोले भटूरे मिलते हैं।

मैंने नीता से पूछा- छोले भटूरे खाओगी क्या?

तो कहने लगी- आप जो भी खिला दो, मैं तो वही खा लूँगी।

छोले भटूरे खाकर हम दोनों चल दिये। जब तक रास्ता सीधा था तब तक तो नीता मुझसे चिपक कर बैठी रही पर जैसे ही हम दोनों चढ़ाई पर चढ़ने लगे तो नीता डरने लगी क्योंकि रास्ते में मोड़ और चढ़ाई बहुत ही ज्यादा थी। नीता कहने लगी- जय, अगर कुछ हो गया तो हम दोनों तो जान से हाथ धो बैठेंगे।

मैंने कहा- नीता, इसीलिये तो मैंने आपको पहले ही मना किया था ! पर आप कहाँ मानने वाली थी? चलो आप उतरो और मेरे पीछे पीछे आओ।

तो नीता कहने लगी- नहीं जय, मुझे डर लगता है, और थक भी बहुत गई हूँ।

क्योंकि रास्ते में भीड़भाड़ भी नहीं थी तो मैंने कहा- डरने की कोई बात नहीं, बस आप मेरे से चिपक कर बैठ जाओ और हिलना डुलना मत ! बात भी मत करना !

तो नीता कहने लगी- ठीक है !

नीता मेरे से चिपक कर बैठ गई पर दो-तीन मोड़ के ही बाद नीता रोने लगी- जय, मुझे बहुत ही डर लग रहा है !

मैंने कहा- नीता, डरने की कोई बात नहीं ! थोड़ी देर आँखें बन्द करके बैठी रहो। जल्दी ही पहुँच जायेंगे।

नीता आराम से बैठ गई, पर जैसे ही मोड़ आता वो चिल्लाना शुरु कर देती। तभी मुझे एक दुकान नजर आई और मैंने बाईक रोककर नीता से कहा- आप आराम से बैठो, मैं अभी आया !

और दुकान वाले से पूछा- पानी मिल सकता है क्या?

तो दुकान वाले ने कहा- हाँ !

और मैंने उससे एक बोतल पानी और एक गिलास प्लास्टिक का लिया। मैं चल दिया तो नीता ने कहा- जय, क्या लिया है?

मैंने कहा- पानी है !

और थोड़ा उपर चढ़ने के बाद नीता फिर से डरने लगी, मैंने कहा- नीता, ठीक है, मैं बाईक साईड में लगाता हूँ।

मैंने बाईक साईड में लगा दी। रास्ता सुनसान था, कोई इक्का-दुक्का ही आदमी नजर आता था। मैंने अपना बैग लिया और बकाडी की बोतल निकाली तो नीता कहने लगी- जय, यह तुम क्या कर रहे हो? हम मन्दिर में जा रहे हैं, आप ये?

मैंने कहा- नीता, आप किसी भी जगह पर जाओ, मन्दिर जाओ या गुरुद्वारे जाओ या मस्जिद जाओ, इससे क्या फर्क़ पडता हैं श्रद्धा तो दिल से होती है !

मैंने एक पैग लिया और फिर से एक पैग थोड़ा हल्का बनाया, नीता को कहा- यह आप पियो !

तो नीता कहने लगी- नहीं जय, मैं कैसे ले सकती हूँ !

तो मैंने कहा- नीता, तुमने मुझे कब से परेशान कर रखा है ! यह ले लो ! डर नहीं लगेगा।

नीता ने अपनी नजर झुका ली, मेरे हाथ से गिलास लिया और एक ही घूंट में पूरा पी गई और कहने लगी- जय यह तो बहुत ठीक है ! रात में तो कुछ अलग ही थी !

मैंने नीता को नमकीन खाने को दी तो नीता ने कहा- जय, एक और गिलास दो ना !

तो मैंने कहा- नहीं नीता, रात में आप सो ली थी, अब काम खराब हो जायेगा !

तो नीता कहने लगी- ठीक है, मैं भी सब समझती हूँ !

मैंने एक और पैग मारा और चल दिया, नीता से कहा- मुझे पकड़ कर बैठना और हिलना डुलना मत !

नीता मुझसे चिपक कर बैठ गई और मैं अपने हिसाब से चलने लगा क्योंकि हम लोगों को 20-25 मिनट से ज्यादा हो गए थे, मैंने स्पीड थोड़ी तेज कर दी और जल्दी अपनी मन्जिल पर पहुँच गये।

नीता से मैंने कहा- बैग मुझे दे दो !

तो मैंने देखा कि नीता तो नशे में है !

नीता ने कहा- जय, हम किस जगह पर हैं?

मैंने कहा- हम मनसा देवी पहुँच चुके हैं।

तो नीता कहने लगी- जय सच में?

मैंने कहा- हाँ !

नीता ने कहा- मजा आ गया।

नीता कहने लगी- जय, मैं जिन्दगी में तुमको कभी नहीं छोडूँगी, मैं तुम को हद से ज्यादा पसन्द करती हूँ।

मैंने कहा- उतरो ! मैं बाईक पार्किग में लगा दूँ नीता जी !

नीता को ना चाहते हुए भी उतरना पड़ा। मैंने दुकान वाले से पूछ कर बाईक लगा दी।

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