लेखक : जीत शर्मा (प्रेम गुरु द्वारा संपादित एवं संशोधित)

मैंने कहीं पढ़ा था अगर कोई अधेड़ स्त्री किसी किशोर लड़के का वीर्यपान करे और उसे चुदाई करवाती रहे तो जवान बनी रहती है और कोई प्रौढ़ आदमी किसी किशोरी से सम्भोग करे या उसका चूत रस पी ले उसकी जवानी लौट आती है।
पता नहीं यह कितना सच था पर मैं तो आज उसे अपना रस पिला कर धन्य ही हो गया था।

मैं होले होले धक्के लगता अपने नितम्ब हिलाता अपनी अंतिम बूँद तक उसके मुँह में ही निचोड़ कर अपने लण्ड को बाहर करना चाहता था। हालांकि कल मास्टरनी ने भी मेरा लण्ड जरुर चूसा था पर यह कान्ता तो उससे बड़ी खिलाड़ी लग रही थी।

सारा माल पी जाने के बाद ही उसने मेरे लण्ड को मुँह से बाहर निकला। और फिर अपने होंठों पर जबान फेरती बोली,’वाह… मेरे सांड, तुम्हारा रस तो घणा मीठा था, मज़ा आ गया!’

सच कहूँ तो उसका मुझे सांड बोलना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था पर मैं उनको नाराज़ भी नहीं करना चाहता था। इसका एक कारण यह भी था कि मुझे उसकी गाण्ड का भूरा छेद बहुत पसंद आ गया था।

अब मास्टरनी पास पड़ी ड्रेसिंग टेबल से दो तीन क्रीम की शीशियाँ निकाल लाई। मुझे बाद में पता चला कि इनमें से एक शहद की शीशी भी है। अब उन दोनों ने अपनी चूत और उरोजों पर खूब सारा शहद लगा लिया। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया।

अब मास्टरनी मेरी ओर आई।
मुझे लगा अब मेरे लण्ड पर भी वो शहद लगाएगी। मेरा मन अब लण्ड चुसवाने को बिल्कुल नहीं कर रहा था।

साली कान्ता ने पूरा निचोड़ लिया था। पर मास्टरनी ने शहद नहीं ढेर सारी चिकनी क्रीम मेरे रामलाल पर लगा दी और उसे हाथ में पकड़कर मसलने लगी।
साथ साथ वो मेरे अण्डों (अण्डकोष) को भी सहलाने लगी थी। थोड़ी देर में उसकी मेहनत रंग लाने लगी। रामलाल फिर से अपना फन उठाने लगा था।

मुझे लगा इस बार मास्टरनी अपनी चूत में लेने वाली है। मुझे लगा अब वो अपनी टांगें चौड़ी करके मुझे अपना लण्ड अन्दर डालने को कहने ही वाली है। फिर उसने कान्ता की ओर इशारा किया। कान्ता ने झट से मेरे लण्ड को अपने हाथों में ले लिया।

मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी कि मास्टरनी हट क्यों गई। अब उसने अपनी एक अंगुली पर ढेर सारी क्रीम लगा कर धीरे से अपनी गाण्ड में डाल ली। उसने ऐसा 2-3 बार किया और फिर अपनी अंगुली को अन्दर बाहर करने लगी। मेरा लण्ड तो अब झटके ही खाने लगा था।

अब मास्टरनी अपने पेट के बल लेट गई। मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। कान्ता मेरी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी। फिर कान्ता ने मेरे लण्ड को छोड़ दिया और मास्टरनी के नितम्बों पर हाथ फिराने लगी।

फिर उसने मास्टरनी के दोनों नितम्बों को चौड़ा कर दिया। काले से रंग का गोल छेद बिल्कुल रंवा और चिकना लग रहा था। अब कान्ता ने मुझे इशारा किया। अब मुझे पूरी बात समझ आ गई।

वाह… मेरी जान…

मैं उसकी जाँघों के बीच आ गया। मैंने पहले तो उस छेद पर अपनी अंगुलियाँ फिराई और फिर उसकी गहराई नापी। मेरी अंगुली आराम से तो नहीं पर थोड़ी फंसी-फंसी अन्दर चली गई।

उसने एक मीठी सीत्कार के साथ अपनी गाण्ड के छेद से संकुचन किया। अब तो मेरा लण्ड तो झटके ही मारने लगा था।

मैंने अपना लण्ड झट से उसकी गाण्ड के छेद पर लगा दिया। मैं चाहता था एक ही झटके में इसकी गाण्ड का किला फ़तेह कर लूं। मैंने एक धक्का लगा दिया। मेरा लण्ड फिसल गया।

‘रे… जीत… बावली बूच की तरह जोर का धक्का ना मार होले होले अन्दर सरका!’

‘ठीक है…!’

कान्ता की हंसी निकल गई। उसने एक हाथ से उसका नितम्ब चौड़ा किये रखा और दूसरे हाथ से अपनी चूत को सहलाने लगी।

अब मैंने अपने एक हाथ से उसके नितम्ब को चौड़ा किये रखा और दूसरे हाथ से अपने लण्ड को पकड़ कर गाण्ड के छेद पर लगाया और फिर से होले से धक्का लगाया।

मास्टरनी थोड़ी सी कसमसाई तो मुझे लगा मेरा लण्ड फिसल जाएगा। मैंने उसे निशाने पर लगाए रखा और फिर एक धक्का लगा दिया। मास्टरनी की गाण्ड तो वैसे भी चिकनाई से भरपूर थी और मेरे लण्ड पर भी क्रीम लगी थी। गप्प से आधा लण्ड अन्दर चला गया।

मास्टरनी की एक मीठी चीत्कार सी निकल गई। मुझे तो विस्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी आराम से लण्ड अन्दर चला जाएगा।
मैंने एक दो बार अपने साथ पढ़ने वाले एक लड़के की गाण्ड मारने की कोशिश की थी पर बहुत मेहनत करने के बाद भी मेरा लण्ड उसकी गाण्ड में नहीं जा पाया था फिर हमने मुट्ठ मार कर ही अपना काम चलाया था।

मेरा आधा लण्ड अभी भी बाहर था। मैं जड़ तक उसे अन्दर ठोकना चाहता था। मैंने जैसे ही झटका लगाने का उपक्रम किया मास्टरनी बोली,’ रे बावली बूच रुक एक मिनट! के जल्दी लाग री सै?’

मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी कि मास्टरनी ने धक्का लगाने से मना क्यों कर दिया। मास्टरनी ने बाद में समझाया कि गाण्ड मरवाना इतना आसान नहीं होता। थोड़ी देर अन्दर जाने के बाद जब वो ठीक से एडजस्ट हो जाए तब चुदाई शुरू की जाती है।

मैं थोड़ी देर ऐसे ही अपना लण्ड उसकी गाण्ड में डाले उसकी जाँघों पर बैठ उसके नितम्बों को सहलाता रहा। कान्ता अपनी चूत में अंगुली करती जा रही थी।

थोड़ी देर बाद मास्टरनी की गाण्ड ने एक दो बार संकोचन किया तब मुझे लगा अब पूरा अन्दर करने का समय आ गया है। अब मैंने अपने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकला और फिर जोर से एक धक्का लगाया। लण्ड पूरा का पूरा अन्दर चला गया।

मास्टरनी आह… उन्ह… करती ही रह गई… ‘ओह… जीत रे तेक होली ओह…?’

अब मैंने अपने लण्ड को अन्दर-बाहर करना चालू कर दिया। सच कहता हूँ मास्टरनी और कान्ता दोनों की चूत हालांकि कसी हुई ही थी पर गाण्ड के कसाव की लज्जत तो कमाल की थी।

इतनी कसी हुई तो मोना की कुंवारी चूत भी नहीं थी। मुझे लगा इसकी गाण्ड तो बिल्कुल कुंवारी जैसी ही है। इस ख़याल से ही मेरा लण्ड तो घोड़े की तरह अन्दर हिनहिनाने लगा।

उधर कान्ता भी जोर जोर से अपनी चूत में अंगुली करते जा रही थी और साथ में सिसिया भी रही थी। अब वो उठ कर मास्टरनी के पास आ गई और अपनी चूत को उसके मुँह से लगाने लगी। मास्टरनी अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठाते हुए बोली,’जीत तू घुटनों के बल हो जा!’

मैंने अपने घुटने मोड़े और फिर उसकी कमर पकडे हुए उसे कुतिया स्टाइल में कर लिया। हमने यह ध्यान रखा कि मेरा लण्ड उसकी गाण्ड में ही फंसा रहे।

अब तो बहुत आसानी हो गई थी। मुझे उसके ऊपर लेट कर धक्के लगाने में थोड़ी दिक्कत सी लग रही थी पर अब तो मैं आराम से धक्के लगाने लगा था।

मास्टरनी आह… उन्ह… करती जा रही थी। साथ साथ में वो अपना एक हाथ पीछे करके मेरे लण्ड को भी चेक कर रही थी कि पूरा अन्दर जा रहा है या नहीं।

कान्ता अपनी जांघें चौड़ी करके उसके मुँह के नीचे लेट गई थी। अब मास्टरनी ने उसकी चूत को चूसना चालू कर दिया। कान्ता ने अपनी जांघें उसकी गर्दन के चारों ओर लपेट ली और और उसका सर अपने हाथों में पकड़ कर जोर जोर से अपने नितम्ब उचकाने लगी।

मैंने उसके नितम्बों पर थपकी भी लगाना चालू कर दिया और अपना एक हाथ नीचे करके उसकी चूत के दाने और फांकों को मसलना चालू कर दिया।

अब तो मास्टरनी ने मेरे धक्कों के साथ अपने नितम्बों को भी आगे पीछे करना चालू कर दिया था।
जैसे ही मैं धक्का लगाने को होता मास्टरनी अपने नितम्बों को पीछे कर देती तो गच्च की सी आवाज आती और उसके नितम्ब थिरक जाते।

कांता मीठी सित्कारें करने लगी थी। लगता था वो झड़ने वाली है। इतने में ही उसके मुँह से एक किलकारी निकली ‘ईईईईईई ईईईई… आह… या…’

और फिर वो मास्टरनी के सर पर होले होले हाथ फिराने लगी।
लगता था वो झड़ गई थी।

‘कान्ता… आह… नीचे आकर मेरी भी चूस ना… साली तेरा तो निकल गया मेरा क्या होगा?’

कान्ता हंसते हुए उसकी जाँघों के नीचे आ गई। मास्टरनी ने अपनी जांघें थोड़ी से चौड़ी कर ली।
अब स्थिति यह थी कि कान्ता नीचे लेटी मास्टरनी की चूत चाट रही थी और मास्टरनी उसकी चूत में अपनी एक अंगुली करने लगी थी।

कभी कभी कान्ता मेरे अण्डों को भी हाथ से पकड़ लेती या मुँह में ले लेती।
मुझे लगा मास्टरनी की चूत ने भी रस छोड़ दिया था जिसे कान्ता चाट रही थी।

मैं आँखें बंद किये मास्टरनी की कमर पकड़े धक्के लगाता रहा।
हमें कोई 20-25 मिनट तो हो ही गए थे, अब तो उसकी गाण्ड बिल्कुल रंवा हो चली थी।
उसकी गाण्ड का छेद तो विक्स की डब्बी जितना चौड़ा लगने लगा था।

अब तो मेरे लण्ड के गाण्ड से बाहर निकलते समय उसकी गाण्ड के छल्ले का लाल लाल चिकना मांस भी नज़र आने लगा था।

मास्टरनी और कान्ता दोनों की सीत्कारें निकल रही थी। मुझे लगा मास्टरनी एक बार फिर से झड़ गई है।

अब मुझे भी लगने लगा था मेरा तोता उड़ने वाला है। पर मैं यह बात उन दोनों का नहीं बताना चाहता था। मुझे डर था इस अंतिम पड़ाव पर अगर मेरा लण्ड बाहर निकल गया तो दुबारा अन्दर नहीं जाएगा और क्या पता मास्टरनी या कान्ता फिर से उसकी मलाई खाने के लिए उसे अपने मुँह में भर ले।

मैं इस बार अपना रस उसकी गाण्ड में ही निकलना चाहता था।

मास्टरनी अब झटके खाने लगी थी। मैंने कस कर उसकी कमर पकड़ ली और जोर जोर से अंतिम धक्के लगाने लगा। मास्टरनी ने मुझे रोकने की थोड़ी कोशिश जरुर की थी पर शायद इस दौरान वो भी झड़ ही रही थी तो फिर उसने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की।

मास्टरनी की एक हलकी किलकारी सी निकल गई और वो अपना मुँह ऊपर करके जोर जोर से सांस लेने लगी। इसके साथ ही मेरी भी पिचकारी फूट गई और उसकी गाण्ड मेरे गाढ़े रस से भरती चली गई।

मास्टरनी की जांघें कांपने लगी थी। जब कान्ता नीचे से हट गई तो मास्टरनी धड़ाम से नीचे गिर पड़ी और मैं उसके ऊपर गिर पड़ा। हम दोनों के शरीर ने झटके से खाए और फिर हम दोनों ही लम्बी साँसें लेते हुए ठण्डे पड़ गए।

कांता मेरी पीठ और नितम्बों को सहलाती रही और साथ साथ अपने स्तनों को भी दबाती रही।

थोड़ी देर बाद हम उठ खड़े हुए। मास्टरनी और कान्ता ने नाइटी पहन ली तो मैंने भी अपने कपड़े पहन लिए।

‘वाह जीत! आज तो मज़ा ही आ गया।’ दोनों हंस पड़ी।

‘सच बताना जीत, इसकी चूत में ज्यादा मज़ा आया या मेरी गाण्ड में?’

अब मैं क्या बोलता। एक की अच्छी बताता तो दूसरी नाराज़ हो जाती। मैं तो किसी को भी नाराज़ नहीं करना चाहता था, मैंने कहा,’दोनों ही लाजवाब थी!’

‘ओये होए… मेरे ताऊ? कोई बात नहीं! कल फिर सही?’ कह कर दोनों हंसने लगी।

‘कान्ता, तू भी कल एक बार गाण्ड मरवा लेना! कसम से मज़ा आ जाएगा!’ मास्टरनी बोली।

‘पर मेरा एक से क्या होगा?’
‘क्या मतलब?’

‘अरी छिनाल… तू सब जानती है… अब मैं जाती हूँ… बहुत देर हो गई… टिम्मी का बापू ना आ गया हो?’ दोनों खिलखिला कर हंस पड़ी।

कान्ता चली गई और मैं भी घर आ गया पर मैं अब यह सोच रहा था कि कान्ता ने ऐसा क्यों कहा ‘मेरा एक से क्या होगा?’

क्या आप कुछ समझे? अगर नहीं समझे तो मैं अगली कथा में आपको बताऊँगा कि इसका क्या अर्थ था। तब तक के लिए

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