प्रेषक : विक्की कुमार

मैं परम आदरणीय गुरुजी का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मेरी आत्मकथा के अंश “हवाई जहाज में चुदाई” को अपनी जग प्रसिद्ध वेबसाईट अंतर्वासना डॉट कॉम में जगह दी। फिर मैं अपने प्रिय पाठकों का भी बहुत शुक्रगुजार हूँ कि आप सभी ने मुझे बेहद सराहा। मुझे सैंकड़ों प्रशंसकों के ईमेल प्राप्त हुए, बदले में मैंने भी उन्हें निजी तौर पर जवाब लिखकर धन्यवाद देने की ईमानदारी से कोशिश की है।

मुझसे अधिकांश पाठकों ने जिज्ञासापूर्वक जानने की कोशिश की कि यह मनघड़ंत कहानी थी या एक सच्चाई। मेरे प्रिय पाठक मित्रो, मैं आपके सामने एक बार फिर दोहरा दूँ कि मैंने जो कुछ भी लिखा वह पूर्ण सत्य है जो वाकयी मेरे साथ इस्तान्बुल जाते समय घटित हुआ था, वे मेरी जिंदगी के कभी ना भुलाने वाले हसीन और यादगार पल थे।

आप सभी ने मुझसे यह भी जानने की कोशिश की है कि क्या क्रिस्टीना वास्तव में भारत आ रही है, इसका जवाब मैं फिर से दोहरा दूं कि जी हां ! वह इस वर्ष गर्मियों में 4 से 6 सप्ताह के लिये भारत आयेगी।

वह मेरे साथ हिमालय की खूबसूरत पहाड़ों पर जायेगी, जहाँ हम कामसूत्र की किताब को आधुनिक परिवेश में लिखने की कोशिश करेंगे क्योंकि आप सभी जानते हैं कि वास्तविक कामशास्त्र बहुत पुराना ग्रंथ है जो लगभग दो हजार वर्ष पुराने भारत के माहौल में लिखा गया है। अब समय की मांग है कि उसे दुबारा से आधुनिक जमाने के हिसाब से लिखा एवं चित्रांकित किया जाये। इसलिये लिखने का काम मैं करुँगा और पेंटिंग बनाने का कार्य क्रिस्टीना स्वयं करेगी।

जैसा कि मैंने पिछले संस्मरण “हवाई जहाज में चुदाई” में वादा किया था कि यदि आपको मेरी आत्मकथा पसंद आयेगी, तो मैं इसके आगे का भाग आपको फिर सुनाऊंगा। सैंकड़ों की तादाद में आपसे मिलने वाले प्रशंसा के पत्र इस बात के गवाह हैं कि आपने मेरी लेखनी को पसंद किया और आप सभी के आग्रह ने मुझे आगे के संस्मरण लिखने को बाध्य कर दिया।

जैसे कि इस्तान्बुल के अतातुर्क इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हम सुबह के करीब साढ़े आठ बजे पहुँचे। आप चौंकिये मत कि जब हम नई दिल्ली से सुबह के चार बजे निकले थे, तो आठ घंटे की यात्रा के बाद सुबह के साढ़े आठ बजे इस्तन्बुल कैसे जा पहुँचे। कारण बतला दूं कि भारत व तुर्की के बीच समयान्तर साढ़े तीन घंटे का है।

अब विमान से बाहर निकलने की बात :

क्रिस्टीना और मैं, हाथ में हाथ डाले लाउंज में बने एक रेस्टोरेंट में बिल्कुल चुपचाप जा बैठे। पेरिस के लिये उसकी अगली फ्लाईट तीन घंटे बाद थी और मुझे भी एयरपोर्ट से बाहर निकल कर होटल जाना था। हम दोनों रात भर के जगे हुए थे, पर नींद आंखो से कोसों दूर थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। ना वह बिछड़ने के लिये तैयार थी और ना ही मैं। मेरे साथ क्रिस्टीना ने भी अपनी जिंदगी का एक अनमोल अनुभव लिया था।

पहले तो विमान में यात्रा के आठ घंटे चुटकी बजाते ही आठ मिनट जैसे बीत गये, पर अब एक-एक मिनट भी एक वर्ष के समान लग रहा था। हम दोनों बिना कुछ बोले हर थोड़ी देर में घड़ी देख रहे थे। मैं विनम्रता पूर्वक स्वीकार करता हूँ कि ऐसा नहीं था कि मैंने जिंदगी मैं कोई पहली बार लड़की के साथ सम्भोग किया हो या फिर ना ही ऐसा था कि क्रिस्टीना ने भी कुवांरी लड़की की तरह पहली बार अपनी सील तुड़ाते हुए अपनी सुहागरात मनाई हो। पर इस रात की – इस चुदाई की – इस चुम्मा चाटी की – इस यात्रा की – इस सहयात्री की – हर बात निराली थी। शायद यह अनुभव जिंदगी में मुझे दुबारा कभी हासिल नहीं होगा।

मुझे अच्छी तरह याद है कि हम दोनों में से कोई भी उस रेस्टोरेंट में बैठे हुए एक शब्द नहीं बोला। हर क्षण पहाड़ जैसा लग रहा था, और अंत में विदाई की निष्ठुर घड़ी आ ही गई। रेस्टोरेंट में लगी घड़ी ने जैसे ही 11 बजने का संकेत दिया, क्रिस्टीना ने इशारा किया कि अब मुझे जाना होगा, मेरी फ्लाईट का समय हो चुका है।

मैं भी उसके साथ उठ खड़ा हुआ और उसे अलविदा कहने के लिये डिपार्चर गेट तक उसके साथ गया। आगे जालिम सिक्योरिटी गार्ड खड़े थे, मैं उसके आगे नहीं जा सकता था क्योंकि सिक्योरिटी चेकिंग के बाद सीधे विमान में प्रवेश करने का रास्ता था। क्रिस्टीना ने मेरे गले लगकर एक लम्बा सा विदाई का चुम्बन दिया और वह विमान में बैठने के लिये आगे बढ़ी। मैं चेतना-शून्य अवस्था में हक्का बक्का सा वहीं खड़ा उसे ताकता रहा, ताकि आँखों से ओझल होने तक उसे निहार सकूँ।

वह आगे बढ़ी, उसकी सिक्योरिटी चेकिंग हुई पर कुछ ही क्षण पश्चात वह आगे बढ़ने के बाद अचानक पलटकर, हिन्दी फिल्मों की तरह, वह अपने हैंड बेग को हाथ में लेकर मेरी तरफ दौड़ी चली आई और मुझसे लिपट गई। उसका चेहरा गवाह दे रहा था कि बिछुड़ने के गम से वह भी उतनी ही व्यथित है जितना कि मैं।

तत्काल मैंने उसका हाथ पकड़ा और लाऊंज में टर्किश एअर लाईन के काउंटर पर जाकर खड़ा हुआ और वहाँ खडी परिचारिका से निवेदन किया कि किसी कारणवश इसे इस्तान्बुल में रुकना पडेगा, अतः इसकी टिकट का एक्सटेंशन कर, परसों सुबह की फ्लाईट में बुक कर दीजिये।

थोड़ी सी ना-नुकुर के बाद उसने उसका रिज़र्वेशन मनचाही फ्लाईट में कर दिया, कारण वैसे भी सीजन नहीं होने से, विमानों में रश नहीं चल रहा था। जैसे ही नया रिज़र्वेशन कन्फर्म हुआ, क्रिस्टीना खुशी के मारे मेरे गले लग गई। अब वह मेरे साथ दो दिन और दो रात इस्तान्बुल में ही रुकेगी, यह जानकर मैं भी उसके गले लग कर अपनी खुशी का इज़हार करने लगा।

मेरे पास तो पहले से ही तुर्की का वीजा था, लेकिन क्रिस्टीना को इस्तान्बुल में प्रवेश हेतु वीजा लेना पड़ा। यूरोप की नागरिक होने के कारण उसे वीजा बहुत ही आसानी से मिल गया। उन लोगों के लिये एयरपोर्ट पर ही एक काउंटर बना हुआ है, जिस पर हाथों हाथ पासपोर्ट पर स्टांप लगाकर वीजा दे देते हैं।

फिर हम दोनों एयर पोर्ट से बाहर आकर मिले। हमने टेक्सी पकड़ी और डाउन टाउन में सुल्तान अहमेत नामक इलाके में होटल में आकर ठहर गये। यहाँ पहले से मेरे नाम से एक कमरा बुक था।

यह इस्तान्बुल का सबसे प्रसिद्ध और दर्शनीय इलाका है। यहाँ से पैदल दूरी पर ही मुख्य आकर्षण की अनेकों प्राचीन इमारतें हैं। हालांकि यह पुराना व भीड़-भाड़ वाला इलाका है, पर इसका भी अपना एक आकर्षण है। समुद्र भी हमारे होटल के बिल्कुल ही नजदीक ही था और हमारे कमरे से उसका खूबसूरत नजारा दिखता था।

हम दोनों रात भर के थके-मांदे अपने कमरे में घुसे और बिस्तर पर ढेर हो गये। एक बार तो इच्छा हुई कि चुदाई का एक और चक्र निपटा लूँ, पर सोचा कि अब जल्दी करने से क्या होगा, क्रिस्टीना कहीं भागी तो नहीं जा रही है, उसे तो मेरे साथ अगले दो दिन और दो रात तक रहना है। बेहतर यह ही होगा कि पहले अपनी थकान मिटा लें।

क्रिस्टीना बिलकुल छोटे बच्चे की तरह मेरे सीने से चिपक सो गई, मैं भी थका हुआ था, अतः क्रिस्टीना के साथ निंदिया रानी के आगोश में समा गया।

मैं अपनी बात को और आगे बढ़ाने से पहले तुर्की और इस्तान्बुल के बारे में थोड़ी सी जानकारी दे आपको दे दूँ कि तुर्की एक मुस्लिम राष्ट्र है, लेकिन यहाँ के मुसलमान बहुत उदारवादी और खुले विचारों वाले होते हैं। विशेषकर इस्तान्बुल की लड़कियां गोरी चिठ्ठी और बेहद खूबसूरत होती हैं। वे पश्चिमी परिधान में जन्नत की हूर जैसी नजर आती हैं।

तुर्की दुनिया का मात्र तीसरा देश है जो दो महाद्वीपों पर बसा हुआ है। तुर्की का अधिकांश भाग एशिया में है, इसका मात्र 3% हिस्सा ही यूरोप में है। इसी प्रकार इस्तान्बुल की आबादी भी एक करोड़ तीस लाख से अधिक होने के कारण, इसकी गिनती भी दुनिया के सबसे खूबसूरत महानगरों में होती है।

मैंने दुनिया के लगभग सभी बड़े शहर देखे हैं लेकिन मैं दावे से कह सकता हूँ कि इस्तान्बुल निश्चित रूप से दुनिया के सबसे खूबसूरत पांच शहरों में से एक है। आखिर क्यों ना हो, यह दुनिया का इकलौता महानगर है जो दो महाद्वीपों यूरोप व एशिया में बसा होने के साथ-साथ, दो समुद्रों मारमरा सी और ब्लेक सी (काला सागर) के किनारे पर बसा हुआ है। यह विश्व की चार महान सभ्यताओं रोमन, लेटिन, बाइजेंटाइन और ओटोमान का आश्चर्यजनक संगम है।

खैर ! मैं भी क्या मूर्ख हूँ जो क्रिस्टीना और मेरे किस्से के बीच में यह क्या तुर्की के भूगोल व इतिहास का रोना लेकर बैठ गया। जबकि आप सभी क्रिस्टीना के शरीर का भूगोल व इतिहास जानने को बेचैन होंगे।

शाम के लगभग 6 बज रहे होंगे, अचानक क्रिस्टीना की नींद खुल गई और वह मेरी बाहों से निकलकर बाथरुम की ओर चली तो मुझे उसके शरीर की मुलायम की गर्मी की कमी महसुस होने से मेरी भी नीन्द खुल गई। अब भूख भी लगने लगी थी क्योंकि सुबह से कुछ नहीं खाया था, कारण हम दोनों होटल में आते ही बिना कुछ खाये पिये ही सो गये थे। मैं विचार कर ही रहा था कि क्या करुँ कि तभी क्रिस्टीना बाथरुम से लौटकर आ गई। उसने मुझे एक मीठा सा चुम्बन देकर गुड इवनिंग कहा और बताया कि उसे भूख लग रही है।

पहले तो मैंने सोचा की कमरे में ही खाने के लिये कुछ मंगवा लें। पर मुझे ख्याल आया कि मैं तो शुद्ध शाकाहारी हूँ, और तो और मैं अंडा भी नहीं खाता हूँ। अतः हिन्दुस्तान को छोडकर दुनिया के लगभग बाकी सभी देशों में मुझे खाने में समस्या आती ही है। क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में वेज व नान वेज में कोई फर्क नहीं होता है। अंडे के बारे में ज्यादातर लोगों में यह भ्रम है कि यह तो वेज ही है। और तो और कई देशों में सी-फ़ूड (मछली, झींगा इत्यादि) को भी वेज खाना मानते हैं। हालांकि मैं एक शुद्ध शाकाहारी हूँ, पर यह अलग बात है कि मुझे औरतों का गर्म गोश्त खाने से कोई एलर्जी नहीं है। उन्हें तो मैं पूर्ण शाकाहारी वस्तु मानकर उनके शरीर के प्रत्येक अंग को पूरा का पूरा ही चबा डालता हूँ।

मैंने सोचा कि अपने लिये शाकाहारी खाने के लिये होटल में बने रेस्टोरेंट से पूछना ही बेहतर होगा। अतः मैंने क्रिस्टीना से कहा- तुम हाथ-मुंह धोकर तैयार हो जाओ, तब तक मैं नीचे रिसेप्शन से खाने के बारे जानकारी लेकर आता हूँ।

उसके हामी भरने के बाद मैंने रिसेप्शननिस्ट से डिनर के बारे में पूछा तो उसना सुझाव दिया कि अभी शाम तो साढ़े सात बजे नजदीक से ही एक क्रूज डिनर के लिये रवाना होगा। क्रुज पर बेहतरीन बेली डांस भी होगा और आपको अपनी शाम को यादगार बनाने के लिये इस्तान्बुल की नाईट लाइफ का आनंद लेना ही चाहिये। यह सुनकर मैं अपने कमरे की ओर दौड़ा और क्रिस्टीना से पूछा कि क्या वह डिनर के लिये, क्रूज पर चलना पसंद करेगी।

वह भी होटल से बाहर निकलकर ताजी हवा खाकर थोड़ा ताज़ा महसूस करना चाहती थी, अतः उसने भी तत्काल हां कर दी। हालांकि पहले मेरा मूड तो होटल में ही खाना खाकर चुदाई समारोह शुरु करने का था, क्योंकि विमान में जो चुदाई का आनंद लिया था, वह अलग किस्म का था। उसमें एक प्रकार का भय भी शामिल था। लेकिन अब बिल्कुल निश्चिंत होकर कमरे में ही रात भर मजे लेने का विचार था। किन्तु बेली डांस का नाम सुनकर मेरी भी इच्छा जागृत हो गई कि थोड़ी देर बाहर समन्दर की ताजी हवा में आउटिंग हो जायेगी और डिनर भी हो जायेगा।

एक बार मैंने बेली डांस काहिरा में नील नदी पर एक क्रूज डिनर के दौरान ही देखा था। वह एक यादगार डिनर था। अतः सोचा की अभी तो शाम ही हुई है, चुदाई के लिये तो अभी रात भर बाकी है। कुछ देर बाहर जाकर खाना खाकर फिर लौट कर चुदाई समारोह शुरु कर देंगे।

हम दोनों तैयार होकर पास ही समुद्रतट पर लगे जहाज़ पर चढ़ गये। थोड़ी ही देर में और भी सैलानी एकत्रित हो गये और फिर निर्धारित समय पर वह रवाना हो गया। इस्तान्बुल शहर के दोनों और बसे दो अलग अलग समुद्रों को मिलाने वाली लगभग 31 किलोमिटर लम्बी स्ट्रेच जिसे बास्फोरस के नाम से भी जाना जाता है, पर हमारा जहाज रवाना हुआ। इसकी चौड़ाई किसी बड़ी नदी के पाट से भी बहुत ज्यादा होगी। उसके दोनों ओर बसा हुआ इस्तान्बुल शहर, शाम के वक्त बत्तियों में बहुत ही खूबसूरत लग रहा था। उसके दोनों ओर किनारों पर बसे खूबसूरत भवन इस्तान्बुल की शान में कशीदा काढ़ रहे थे। इस स्ट्रेच के एक ओर का हिस्सा यूरोप में था और दूसरी ओर का हिस्सा एशिया में, जो अनेकों जगह से पुलों द्वारा आपस में जुड़ा हुआ था।

जहाज़ के डेक पर वेटर दौड़-दौड़ कर लजीज भोजन परोस रहे थे, कि तभी साजिन्दों के साथ खूबसूरत डांसरों ने प्रवेश किया। फिर शुरु हुआ इन्द्र-सभा को मात देने वाली अप्सराओं का मादक नृत्य।

ठंडी हवाओं से बचाव के लिये चारों ओर शीशे की छत और दीवाल बनी थी।

मैं आपकी जानकारी के लिये बतला दूँ कि बेली डांस अरब जगत का बहुत पुराना नृत्य है, जिसे अरेबिक डांस कहा भी जाता है। यह एशिया एवम् अफ़्रीका में फेले अनेकों अरबी देशों में प्राचीन काल से ही बहुत ही प्रसिद्ध है। इस डांस में शरीर के सभी अंगों को उपयोग में लाया जाता है, विशेषकर कमर के हिस्से को, इसीलिये इसे पश्चिमी जगत में बेली डांस के नाम से जाना जाता है। यह कह दें कि कमर के साथ नर्तकी के कूल्हे भी उत्तेजक मुद्रा में मटकते हैं, तो गलत नहीं होगा।

शायद आपको याद होगा अभिषेक बच्चन व ऐश्वर्या राय की फिल्म “गुरु” जिसके शुरु में मैय्या-मैय्या वाला गाना, वह एक बेली डांस ही था।

इसी प्रकार तुर्की का एक और “सूफी-दरवेश डांस” भी विश्व प्रसिद्ध है, जिसमे सूफी लोग गोल-गोल घुमकर डांस करते हैं। इसके भी इस्तन्बुल में शो भी होते रहते हैं। शायद आपको बहुचर्चित फिल्म जोधा-अकबर का गाना – “ख्वाजा मेरे ख्वाजा, मेरे दिल में समा जा” याद होगा। वह भी तुर्की का सूफी-दरवेश डांस ही था।

खैर पता नहीं आप भी मेरे बारे में क्या सोचते होंगे कि क्यों मैं बार बार विषय से भटक जाता हूँ। ऐसा लगता है कि मुझे किसी यूनिवर्सिटी में भूगोल-इतिहास का प्रोफेसर होना था। इसके बजाय मैं नसीब का मारा, इन्जिनीयर बनने के बाद भी किसी एयर-कंडीशंड आफिस में 9 से 5 बैठने के बजाय दुनिया भर में दर-दर भटकता फिर रहा हूँ।

मैंने केबरे, स्ट्रीप, डिस्को, साम्बा, सालसा जैसे अनेकों तरह के डांस देखे हैं, पर बेली डांस की बात कुछ और ही है।

क्रिस्टीना मेरे से सटकर बैठी खाना खा रही थी, कि तभी एक डांसर हमारे पास में आई और हमें हाथ पकड़कर डांस-फ्लोर पर ले गई। फिर क्या था, हम लोग भी उनकी स्टेप्स की नकल कर, डांस करने लगे। फिर क्रिस्टीना मेरे से चिपक कर डांस करने लगी। उसके उन्न्त वक्ष मेरे सीने से लगकर मेरे लिंगराज की आग को भड़काने लगे। मैं तो उसका दीवाना हो गया। मैंने भी उसे अपनी बाहों में भींच लिया और डांस करने लगा।

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